यह ख़बर 18 मार्च, 2011 को प्रकाशित हुई थी

'पहले आओ-पहले पाओ की नीति 2001 में लागू हुई'

खास बातें

  • सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि स्पेक्ट्रम आवंटन के लिये पहले आओ-पहले पाओ का विवादास्पद तरीका जनवरी 2001 में लागू किया गया।
New Delhi:

सरकार ने गुरुवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि स्पेक्ट्रम आवंटन के लिये पहले आओ-पहले पाओ का विवादास्पद तरीका जनवरी 2001 में लागू किया गया। उच्चतम न्यायालय ने सरकार से यह सवाल किया था कि यह अवधारणा कब से अपनायी गयी। इसी पर सरकार की ओर से यह जवाब आया है। टू-जी स्पेक्ट्रम आवंटन की जांच कर रही एजेंसियों के अनुसार, पहले आओ-पहले पाओ की नीति में 2-जी लाइसेंस और स्पेक्ट्रम दिलाने में कुछ कंपनियों को अन्य की तुलना में फायदा पहुंचाने के लिये बदलाव किया गया। सरकार की ओर से हाजिर एटॉर्नी जनरल गुलाम ई वाहनवती ने उच्चतम न्यायालय को जानकारी दी कि शीर्ष अदालत की निगरानी के दायरे में आयी यह प्रक्रिया दूरसंचार विभाग ने शुरू की थी ताकि वर्ष 2001 से स्पेक्ट्रम की शुरुआत के साथ ही दूरसंचार लाइसेंसों का आवंटन किया जा सके। यह मामला सलाह-मशविरे के लिये कभी भी ट्राई को नहीं भेजा गया। वाहनवती ने पीठ से कहा, पहले आओ-पहले पाओ से संबंधित यह मुद्दा कभी भी ट्राई के पास नहीं भेजा गया। उन्होंने कहा कि सरकार ने इसे सबसे पहले 21 जनवरी 2001 को मूल सेवा प्रदाताओं को दूरसंचार स्पेक्ट्रम आवंटित करने के लिये अपनाया था। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि टीआरएआई ने 122 लाइसेंसों में से 69 को रद्द करने की अनुशंसा की है क्योंकि लाइसेंस देने की शर्तों के मुताबिक वे निश्चित समय सीमा के भीतर सेवा शुरू नहीं कर सके। इससे पहले पीठ ने 11 निजी दूरसंचार कंपनियों को नोटिस जारी किया था जिन्हें कथित तौर पर अयोग्य होने के बावजूद लाइसेंस दिया गया था या निश्चित समय सीमा के अंदर वे सेवा शुरू करने में विफल रहे। जिन निजी दूरसंचार कंपनियों को नोटिस जारी किये गये उनमें इटीसालट यूनिनोर, लूप टेलीकॉम, वीडियोकॉन, एस-टेल, अलायंज इन्फ्रा, आइडिया सेलुलर, टाटा टेलीसर्विसेज, सिस्टेमा श्याम टेलीसर्विसेज, डिशनेट वायरलेस, वोडाफोन-एस्सार के साथ ही टीआरएआई भी शामिल है। टू जी आवंटन घोटाले से फायदे में रहने वाली दूरसंचार कंपनियों ने स्पेक्ट्रम आवंटन में किसी तरह की अवैधता से इनकार किया और उच्चतम न्यायालय से कहा कि अगर राजा के कार्यकाल में पहले आओ पहले पाओ नीति को अवैध माना जाता है तो वर्ष 2003 से सभी आवंटनों को निरस्त किया जाये। मामले में अदालती सुनवाई ने वस्तुत: पुराने सेवा प्रदाताओं के साथ लड़ाई का रूप ले लिया जिन्होंने तर्क दिया कि उनको आवंटित स्पेक्ट्रम वैध हैं और नयी कंपनियों के साथ उनकी तुलना नहीं की जानी चाहिए जिनके लाइसेंस न्यायिक निगरानी के दायरे में हैं।


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