फिल्मी दुनिया में कई बार कहानी से ज्यादा किसी सीन का अंदाज दर्शकों के जेहन में बस जाता है. अनुराग कश्यप की फिल्मों की खासियत हमेशा से यही रही है कि उनके किरदार, डॉयलॉग्स और छोटे-छोटे सीन बेहद अलग अंदाज में दर्शकों तक पहुंचते हैं. ऐसा ही एक सीन गैंग्स ऑफ वासेपुर 2 में देखने को मिला, जहां मातम के माहौल के बीच एक स्थानीय गायक का अंदाज काफी पसंद किया गया. सीन में एक्टर यशपाल शर्मा ने माइक संभाला और दर्द भरे गीत को कुछ इस तरीके से पेश किया कि उसके नाटकीय और अजीबोगरीब अंदाज ने उसे यादगार बना दिया.
सरदार खान की मय्यत में गूंजा अजीब अंदाज वाला गीत
वैसे तो पूरी गैंग्स ऑफ वासेपुर सीरीज ही अपनी दमदार कहानी, शानदार डायलॉग्स और किरादरों के चलते दर्शकों के मन में खास जगह बनाए हुए है. लेकिन ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर 2' में सरदार खान (मनोज बाजपेयी) की मय्यत वाला सीन अपनी अजीबोगरीब गायकी और नाटकीय अंदाज की वजह से कुछ ज्यादा ही यादगार बन गया. फिल्म में इस अंतिम यात्रा के दौरान एक स्थानीय गायक की भूमिका निभाने वाले अभिनेता यशपाल शर्मा माइक पर नजर आते हैं. माहौल बेहद गमगीन है, लेकिन गाने की प्रस्तुति पारंपरिक शोकगीत जैसी सीधी और गंभीर नहीं रखी गई. यशपाल शर्मा ने इसे बेहद नाटकीय अंदाज में गाया, जिसमें भावनाओं के साथ एक अजीब तरह की ओवर एक्टिंग भी दिखाई देती है. उनके मुंह से निकलते बोल और गाने का अंदाज सीन को अंतिम यात्रा से बिल्कुल अलग रंग दे देता है. यही वजह है कि छोटा सा यह पल फिल्म देखने वालों की याद में रह गया.
‘याद तेरी आएगी...' ने बढ़ाया सीन का अजीब रंग
इस सीन में गायक माइक पर 'याद तेरी आएगी, हमको बड़ा सताएगी...' गाता नजर आता है. गाने के बोल जहां किसी बिछड़े व्यक्ति की याद और दुख को सामने रखते हैं, वहीं प्रस्तुति का अंदाज इसे सामान्य मातमी माहौल से अलग बना देता है. यशपाल शर्मा ने किरदार को जिस तरह निभाया, उसमें स्थानीय कार्यक्रमों में दिखाई देने वाली कुछ खास किस्म की गायकी और नाटकीय अंदाज की झलक मिलती है. यह गाना इतना अजीब लगता है कि सीन में मौजूद गंभीरता के बीच एक अलग तरह का ह्यूमर पैदा होता है.
‘गैंग्स ऑफ वासेपुर' की यही खासियत रही कि फिल्म ने हिंसा, राजनीति, बदले और अपराध की कहानी के बीच ऐसे स्थानीय रंगों और किरदारों को जगह दी, जो पूरी दुनिया को रियल और अनगढ़ महसूस कराते हैं. यशपाल शर्मा का यह छोटा सा किरदार भी उसी माहौल को मजबूत करता है. मय्यत और अंतिम यात्राओं जैसे गंभीर मौकों पर स्थानीय गायन की शैली को जिस तरह फिल्म में इस्तेमाल किया गया, वह कहानी के देसी और व्यंग्यात्मक टोन के साथ पूरी तरह फिट बैठता है.
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