स्मिता पाटिल एक महान और बेहद प्रतिभाशाली एक्ट्रेस थीं. उन्होंने मुख्य रूप से हिंदी और मराठी समांतर (पैरेलल) और व्यावसायिक हर तरह की फिल्म में काम किया. उनका जन्म 17 अक्टूबर 1955 को पुणे, महाराष्ट्र में हुआ था. उनके पिता शिवाजीराव पाटिल एक राजनेता और स्वतंत्रता सेनानी थे तथा माता विद्याताई पाटिल एक समाज सेविका थीं. उन्होंने श्याम बेनेगल की फिल्म 'चरणदास चोर' (1975) से अभिनय की शुरुआत की. अपने छोटे से करियर में उन्होंने लगभग 80 से अधिक फिल्मों में काम किया. उनकी कई फिल्में हिट हुई और उन पर फिल्माए गए गाने आज भी खूब पसंद किए जाते हैं. हम आज उनके जिस गाने की बात कर रहे हैं, वह फिल्म आखिर क्यों ? का हिट सॉन्ग है.
यह गाना दोस्त के दुश्मन बनने और प्यार-दर्द-तन्हाई को बयां करने के बारे में है. 1985 में रिलीज हुई फिल्म 'आखिर क्यों' प्यार में धोखा खाए लोगों को प्रेरणा और साहस देता है. इस गाने को राजेश रोशन ने संगीत दिया था. साथ ही लता मंगेशकर और अमित कुमार ने अपनी आवाज दी है. इंदीवर ने इस गीत को लिखा है. यह स्मिता पाटिल और सुपरस्टार राजेश खन्ना पर फिल्माया गया है.
गीत का पहला अंतरा-
'दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है
उम्र भर का गम हमें ईनाम दिया है'
यह अंतरा प्रेम के बाद मिले धोखे और तन्हाई के गम को व्यक्त करता है. इसके अनुसार धोखा खाया साथी इस बेवफाई को उम्र भर का ईनाम समझ बैठता है. साथी प्रेम के धोखे को भी एक सौगात मानता है.
'तूफां में हमको छोड़ के साहिल पे आ गये
तूफां में हमको छोड़ के साहिल पे आ गये
नाखुदा का हमने जिन्हें नाम दिया है
उम्र भर का गम हमें ईनाम दिया है'
अगले अंतरे में वह बेवफा साथी पर इल्जाम लगाता है. प्रेम में साथ छोड़ने पर निराश प्रेमी चाहकर भी दोबारा जुड़ नहीं पाता.
'पहले तो होश छीन लिए जुल्म-ओ-सितम से जुल्म-ओ-सितम से
दीवानगी का, दीवानगी का फिर हमें इल्जाम दिया है
उम्र भर का गम हमें ईनाम दिया है
गाने में कहा गया है, प्रेम में साथ रहने का वादा करने के बाद साथ छोड़ कर जाने के बाद दूसरे के लिए उससे निकलना बहुत ही मुश्किल है. बदनामी का दाग सहना बेहद मुश्किल है. इंसान जिंदगी भर भटकता रह जाता है और आखिरकार परेशान होकर मौत को गले लगा लेता है. आगे का अंतरा परेशान प्रेमी को दिलासा देता है. सहारा देते हुए कहता है.
'अपने ही गिराते हैं नशेमन पे बिजलियां नशेमन पे बिजलियां
गैरों ने आ के गैरों ने आ के फिर भी उसे थाम लिया है
उम्र भर का गम हमें ईनाम दिया है'
यह अंतरा प्रेम को दोबारा मौका देता है. अपने ही गिराते हैं नशेमन में बिजलियां यानी चाहे जो हो जिंदगी को संभालने की कोशिश करो.अंतिम अंतरा प्रेमी को फर्ज की याद दिलाता है. अंतरा कहता है कि प्रेम में फर्ज निभाना सबसे अहम है. सच्चे प्रेम के लिए यह बेहद जरूरी है.
'बन के रकीब बैठे हैं वो जो हबीब थे, वो जो हबीब थे
यारों ने खूब, यारों ने खूब फर्ज को अंजाम दिया है
उम्र भर का गम हमें ईनाम दिया है
दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है
उम्र भर का गम हमें ईनाम दिया है'
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