रेखा की उमराव जान 1981 में रिलीज हुई थी. यह भारतीय सिनेमा की एक ऐतिहासिक और संगीतमय ड्रामा फिल्म है, जिसका निर्देशन मुजफ्फर अली ने किया था. यह फिल्म मिर्जा मोहम्मद हादी रुसवा के प्रसिद्ध 1899 के उर्दू उपन्यास "उमराव जान अदा" पर आधारित है. कहानी 1840 के दशक की है, जहां फैजाबाद की एक छोटी बच्ची अमीरन का अपहरण कर लिया जाता है और उसे लखनऊ के एक कोठे पर बेच दिया जाता है. कोठे पर उसका नाम बदलकर उमराव जान रख दिया जाता है, जहां उसे संगीत, नृत्य और शायरी की तालीम दी जाती है. वह आगे चलकर लखनऊ की एक मशहूर तवायफ और कवयित्री बनती है. उमराव जान हिट हुई थी और कई पुरस्कार जीते. 29वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में इसने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री (रेखा) सहित 4 पुरस्कार जीते . इसे 3 फिल्मफेयर पुरस्कारों के लिए भी नामांकित किया गया था , जिसमें इसने सर्वश्रेष्ठ निर्देशक (मुजफ्फर अली ) और सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक ( खय्याम ) का पुरस्कार जीता. आज हम इस फिल्म के बारे में खास बातें बताने जा रहे हैं, जो कम ही फैंस को पता होंगी...
यह फिल्म आज भी लखनऊ की पहचान बनी हुई है. नवाब वाजिद अली शाह प्राणी उद्यान ( लखनऊ चिड़ियाघर) में भारतीय सिनेमा के इतिहास के सबसे मशहूर फिल्म सेट में आज भी लगा हुआ है. चिड़ियाघर के 71 एकड़ के इलाके में वास्तुकला का एक शानदार नमूना मौजूद है. 'नगीने वाली बारादरी', जो 1820 के दशक के आखिर में बना बारह मेहराबों वाला एक खुला मंडप है. 19वीं सदी की इस शाही इमारत की ऊंची मेहराबों के नीचे, डायरेक्टर मुजफ्फर अली ने मिर्जा रुस्वा के मशहूर उर्दू नॉवेल 'उमराव जान अदा' को पर्दे पर उतारा था और रेखा की यादगार परफॉर्मेंस 'इन आंखों की मस्ती के' को फिल्माया था.
'उमराव जान' की शूटिंग की योजना बनाते समय, डायरेक्टर मुजफ्फर अली मुंबई के साउंडस्टेज के बनावटी और चमकदार लुक से बचना चाहते थे. कोटवारा के राजा के तौर पर वह अवधी इतिहास का असली एहसास चाहते थे और उन्होंने लखनऊ में 19वीं सदी की बची हुई ऐतिहासिक इमारतों को चुना. डायरेक्टर ने एक बार 'द हिंदू' से कहा था, "उमराव जान से पहले, फिल्मों में लखनऊ के किरदारों और जगहों को तो दिखाया जाता था, लेकिन उसकी असली रूह को कभी नहीं. शहर का जिक्र होता था, वहां के किरदार होते थे, लेकिन उसकी असलियत – उसकी महक, बनावट और जज़्बाती मौजूदगी कभी सामने नहीं आई. किसी को समझ नहीं आया कि लखनऊ की पहचान को फिल्मों में कैसे उतारा जाए."
चिड़ियाघर के अंदर बनी बारादरी इसके लिए एकदम सही जगह साबित हुई. नवाब नसीरुद्दीन हैदर ने इसे शाही आम के बागों (बनारसी बाग) में गर्मियों के लिए एक निजी आरामगाह के तौर पर बनवाया था. 1920 के दशक में सर हरकोर्ट बटलर ने इस जगह को 'प्रिंस ऑफ वेल्स जूलॉजिकल गार्डन्स' में बदल दिया और जानवरों के बाड़ों के बीच बनी पुरानी इमारतों को सुरक्षित रखा. इन इमारतों में शाही दौर की वास्तुकला की झलक मिलती थी और मुजफ्फर अली ने 1981 में इन्हें सिनेमा के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज कर दिया. 12 खुले मेहराबों (आर्चवे) की वजह से सिनेमैटोग्राफर प्रवीण भट्ट सेंट्रल हॉल में पेड़ों की घनी पत्तियों से छनकर आने वाली हल्की, कुदरती रोशनी भर पाए. एक जैसे डिजाइन की वजह से कैमरे को 360-डिग्री घूमने और लगातार ट्रैकिंग शॉट्स लेने की आजादी मिली. कैमरा रेखा के चारों ओर घूमता था और बैकग्राउंड के मेहराबों में बैठे शाही दर्शकों को भी फ्रेम में रखता था. फिल्ममेकर ने 'डायरेक्टर्स नोट्स' को बताया, एक पेंटर होने के नाते, मुझे पता था कि रंगों, रोशनी और परछाई के साथ कैसे बात की जाती है.
'उमराव जान' की कामयाबी ने रेखा का करियर बदल दिया और उन्हें 1982 में बेस्ट एक्ट्रेस का नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला. फिर भी, फिल्म इतिहासकारों और लखनऊ आने वाले लोगों के लिए, यह गाना चिड़ियाघर के अंदर बनी ईंटों की मेहराबों से हमेशा के लिए जुड़ गया है. आज, जहां पर्यटक चिड़ियाघर में जंगली जानवरों को देखने आते हैं, वहीं फिल्म के शौकीन बारादरी के ऊंचे संगमरमर के फर्श तक जरूर आते हैं. वे उसी फ्रेम में कदम रखते हैं जहां रेखा की नजर ने भारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर को परिभाषित किया था.
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