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Musafir Cafe Review: पहाड़, सुकून, प्यार और अधूरे सपने, रफ्तार धीमी, लेकिन साथ नहीं छोड़ती विक्रांत मैसी की मुसाफिर कैफे

दिव्या प्रकाश दुबे के इसी नाम के नॉवेल पर आधारित, नेटफ्लिक्स सीरीज 'मुसाफिर कैफे' प्यार और ब्रेकअप की कोई अनोखी कहानी नहीं सुनाती. इसके किरदार भी ऐसे नहीं हैं जिनके बारे में आपने पहले पढ़ा, सुना या देखा न हो.

Musafir Cafe Review: पहाड़, सुकून, प्यार और अधूरे सपने, रफ्तार धीमी, लेकिन साथ नहीं छोड़ती विक्रांत मैसी की मुसाफिर कैफे
अधूरे सपने की कहानी है मुसाफिर कैफे
नई दिल्ली:

'मुसाफिर कैफे' ऐसे समय में आया है, जब पूरा देश एक सिस्टम के खिलाफ गुस्से में है. इसके मुख्य किरदार चंदर कुमार शर्मा (विक्रांत मैसी) कहते हैं कि प्यार में कुछ भी सही या गलत नहीं होता. उसी तरह, किसी क्रिएटिव चीज की अपनी किस्मत होती है. हो सकता है कि अभी सही समय न हो, लेकिन जब तूफान शांत होगा, तो इसे अपने दर्शक मिल ही जाएंगे. दिव्या प्रकाश दुबे के इसी नाम के नॉवेल पर आधारित, नेटफ्लिक्स सीरीज 'मुसाफिर कैफे' प्यार और ब्रेकअप की कोई अनोखी कहानी नहीं सुनाती. इसके किरदार भी ऐसे नहीं हैं जिनके बारे में आपने पहले पढ़ा, सुना या देखा न हो. 20 मिनट के आठ एपिसोड में बहुत कुछ खास नहीं होता, लेकिन कहानी की असल खूबी इसके आमपन में है, एक लड़के और लड़की के मिलने और शादी के सपने के बीच प्यार और जिंदगी को संभालने के उनके रोजमर्रा के तरीके में.

शरण्य राजगोपाल द्वारा लिखी और बनाई गई 'मुसाफिर कैफे' प्यार की कोई बहुत अच्छी या आदर्श तस्वीर नहीं दिखाना चाहती. मसूरी की पहाड़ी गलियों की तरह, किरदारों को भी नहीं पता कि आगे क्या होने वाला है. आखिर, गलियां जवाब नहीं ढूंढतीं. वे बस दिखाती हैं कि हम कौन हैं.  इसे रुचिर अरुण ने डायरेक्ट किया है, जिन्होंने नेटफ्लिक्स के सबसे पसंदीदा शो में से एक 'लिटिल थिंग्स' के कुछ एपिसोड डायरेक्ट किए थे. यह सीरीज एक मॉडर्न लव स्टोरी की सभी खूबियों को दिखाती है. कैफे, घूमना-फिरना, कॉर्पोरेट जिंदगी की थकान, पहाड़ों में सुकून भरी जिंदगी, करियर बनाम प्यार, कमिटमेंट से डर, वगैरह.

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सीरीज मॉडर्न लव स्टोरी की खूबियों को दिखाती है

रुचिर अरुण ने शो को बहुत ज्यादा घटनाओं से बोझिल नहीं बनाया है. उन्होंने इसे विक्रांत मैसी, महिमा मकवाना और वेदिका पिंटो की बेहतरीन एक्टिंग के दम पर आगे बढ़ने दिया है. भोपाल में परिवारों की तय की गई एक मैट्रिमोनियल डेट पर चंदर की मुलाकात सुधा (वेदिका पिंटो) से होती है. उससे मिलने से पहले, चंदर ने उसे पास की टेबल पर बैठे एक संभावित दूल्हे पर चिल्लाते हुए सुना था. यही उनकी पहली मुलाकात थी. कुछ घिसी-पिटी बातें, तो कुछ दिलचस्प बातें. सुधा साफ कर देती है कि वह शादी नहीं करना चाहती, हालांकि वह संभावित दूल्हों से मिलती रहती है. चंदर उसे रिजेक्ट कर देता है, लेकिन फिर भी उनका रिश्ता आगे बढ़ता है. 

आगे की कहानी

चंदर और सुधा के अलग हुए आठ साल बीत चुके हैं. चंदर मसूरी की पहाड़ियों में अपना सपनों का कैफे खोलता है. उसकी मौजूदा पार्टनर प्रीति (महिमा मकवाना) है. कैफे का नाम 'मुसाफिर कैफे' रखा गया है - यह नाम सुधा ने आठ साल पहले चंदर की डायरी में उसके कैफे के स्केच के ऊपर लिखा था.'मुसाफिर कैफे' कोई 'लिटिल थिंग्स' (नेटफ्लिक्स ओरिजिनल) या 'परमानेंट रूममेट्स' (अमेजन प्राइम ओरिजिनल) जैसी सीरीज नहीं है. सुधा और चंदर ने लिव-इन रिलेशनशिप की बारीकियों को समझने की कोशिश नहीं की. कम से कम चंदर को हमेशा यह साफ था कि उसे परिवार, पत्नी और बच्चे चाहिए. सुधा ने अपने लिए एक अलग जिंदगी की कल्पना की थी क्योंकि वह करियर और प्यार को एक साथ नहीं देख पा रही थी. लेकिन प्यार तो होना ही था. इसलिए आखिर में जब चंदर एक इमोशनल सीन में सुधा से उसके फैसलों के बारे में बात करता है, तो वह सच्चा, ईमानदार और कमजोर महसूस होता है.

शायद चंदर और सुधा दोनों ही अपनी-अपनी जगह सही हैं. सुधा को 'लेबल' करना और उसे एक दायरे में रखना आसान है क्योंकि वह प्यार को अपनी सुविधा के हिसाब से देखती है. लेकिन 'मुसाफिर कैफे' की खूबसूरती यही है कि ऐसे किरदार असल में होते हैं. हमने अपने दोस्तों और साथ काम करने वालों के बीच ऐसे लोगों के बारे में सुना भी है.

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जब सुधा और चंदर अपनी-अपनी जिंदगी का सफर तय कर रहे होते हैं, तो रिश्ते और उसके बदलते पहलुओं को दिखाने का काम दूसरे किरदार करते हैं. चंदर के लिए उसकी मां (अनुभा फतेहपुरिया) हैं. प्रीति के लिए लेखक और उनके कैफे में अक्सर आने वाले राहिल (राजीव सिद्धार्थ) हैं. चंदर और सुधा के लिए मार्क और नीलिमा (आदिल हुसैन और सादिया सिद्दीकी) हैं.

करियर और प्यार हमेशा एक-दूसरे के दुश्मन नहीं होते और न ही हर रिश्ते को समाज की मंजूरी की जरूरत होती है, लेकिन चंदर और सुधा ने बिना किसी स्पष्ट अंत (क्लोजर) के अपने नए साथियों के साथ आगे बढ़ना चुना.  कहानी की सादगी इसके हर एपिसोड के एक शब्द वाले नामों में भी दिखती है. अराइवल (आगमन), स्टे (ठहराव), चॉइस (चुनाव), ट्रिप (यात्रा), सरप्राइज़ (हैरानी), ट्रुथ (सच), डिस्टेंस (दूरी) और अराइवल (आगमन).

पहले और आठवें एपिसोड के नाम एक जैसे हैं, जो कहानी के गोल-गोल घूमने वाले सफर (सर्कुलर जर्नी) की ओर इशारा करते हैं. कहानी फ्लैशबैक और फ़्लैश-फॉरवर्ड के जरिए आगे बढ़ती है, लेकिन 'अराइवल' का गोल-गोल घूमना यह दिखाता है कि कहानियां कभी खत्म नहीं होतीं. बस सालों के साथ किरदार बदलते रहते हैं.

 सलमान खान की फिल्म 'अंतिम' से हिंदी में डेब्यू करने वाली महिमा मकवाना ने शो में चौंकाने वाला काम करती हैं. इमोशनल सीन में उनकी आंखें बहुत कुछ कहती हैं, और एक आदमी की जिंदगी में 'दूसरे प्यार' के तौर पर उनकी कमजोरी को दिखाती हैं. एक्ट्रेस वेदिका पिंटो की जिंदादिली और चार्म सुधा के किरदार से पूरी तरह मेल खाते हैं. लेकिन इमोशनल सीन में वह थोड़ी कमजोर पड़ जाती हैं.  प्यार में डूबे किरदारों को निभाने के लिए मशहूर विक्रांत मैसी ने इस सीरीज को अपने कंधों पर संभाला है,  

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