फिल्ममेकर तिग्मांशु धूलिया ने भारतीय सिनेमा में सेंसरशिप के इतिहास को लेकर खुलकर बात की और साथ ही साथ इस बात पर भी खुलकर बोले कि फिल्ममेकर्स ने किस तरह समय समय पर राजनीतिक पाबंदियों का सामना किया है. तिग्मामशु ने न्यूज पब्लिकेशन द वायर के एक प्रोग्राम में बातचीत करते हुए कहा कि आजादी के आंदोलन के दौरान फिल्ममेकर्स अपनी फिल्मों से ऐसे राजनीतिक मैसेज देने में कामयाब रहे दो अक्सर ब्रिटिश अधिकारियों की समझ से परे होते थे.
तिग्मांशु ने कहा, जब आजादी की लड़ाई चल रही ती तो हमारे फिल्ममेकर्स ने इतनी बारीकी से फिल्में बनाईं कि अंग्रेज समझ ही नहीं पाए कि अशल में चल क्या रहा है. उस समय समाज अलग था. उन्होंने उदाहरण के तौर पर ज्ञान मुखर्जी की फिल्म चल चल रे नौजवान की बात की. 1944 में आई इस फिल्म में लेखकों में से एक सादत हसन मंटो थे और संगीत गुलाम हैदर का था. इस फिल्म में अशोक कुमार लीड रोल में थे.
सेंसर बोर्ड ने दिलीप कुमार को 'हे राम' बोलने से रोका
तिग्मांशु धूलिया ने वो घटना भी याद की जब दिलीप कुमार की फिल्म 'गंगा जमुना' को लेकर काफी विवाद हुआ था. दरअसल इस फिल्म में मरते वक्त दिलीप कुमार को 'हे राम' कहना था लेकिन सेंसर बोर्ड ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया. सेंसर बोर्ड की दलील थी - आप हे राम कैसे कह सकते हैं? आप तो मुसलमान हैं.
दिलीप कुमार निभा रहे थे हिंदू किरदार
तिग्मांशु ने बताया कि फिल्म बनाने वालों का कहना था कि दिलीप कुमार फिल्म में गंगा नाम के एक हिंदू शख्स के किरदार में थे. धूलिया का कहना था कि फिल्म में किरदार हिंदू है तो वह हे राम कह सकता है. लेकिन सेंसर बोर्ड इससे सहमत नहीं था. आखिर में मामला प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पास पहुंचा. उन्होंने फिल्म देखी और कहा इसमें कोई समस्या नहीं. इसके बाद मुसीबत यह थी कि अगर एक फिल्म पास होती तो लोग कहते कि दिलीप कुमार ने अपनी जान-पहचान से फिल्म पास करवा ली. ऐसे में वो दूसरी फिल्में भी पास कर दी गईं जिन्हें किसी वजह से रोका गया था.
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