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ना शेर सी दहाड़, ना चीते सी रफ्तार, धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना के दौर में एक सीधा-सादा बैंक क्लर्क बना सुपरस्टार

ना सिक्स पैक ऐब्स ना ही बलशाली शरीर, धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना के दौर में एक बैंक क्लर्क जो बन गया स्टार. आज भी इसकी फिल्में देख चेहरे पर आती है मुस्कान, समझ आता है जिंदगी का असली फलसफा.

ना शेर सी दहाड़, ना चीते सी रफ्तार, धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना के दौर में एक सीधा-सादा बैंक क्लर्क बना सुपरस्टार
ना सिक्स पैक ऐब्स ना ही बलशाली शरीर, धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना के दौर में बना स्टार
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नई दिल्ली:

ना शेर सी दहाड़. ना चीते सी रफ्तार. ना ही सिक्स पैक ऐब्स. ना ही बलशाली शरीर. फिर भी एक बैंक क्लर्क कैसे धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना के सिनेमाई दौर में स्टार बन गया यह जादुई कहानी से कम नहीं है. इस कलाकार ने ऐसे मध्यवर्गीय किरदार निभाए जिन्होंने भारतीय सिनेमा में गहरी छाप छोड़ी. इस एक्टर ने दिखा दिया है कि एक्टिंग बाहुबल या शारीरिक सौंदर्य से आगे की चीज है. हम बात कर रहे हैं 1970-80 के दशक के मिडिल-क्लास सिनेमा के सबसे बड़े चेहरों में शुमार एक्टर अमोल पालेकर की.

बैंक क्लर्क से थिएटर तक का सफर

अमोल पालेकर का जन्म 24 नवंबर 1944 को हुआ. पिता जनरल पोस्ट ऑफिस में काम करते थे, माता प्राइवेट कंपनी में. मुंबई के बाल मोहन विद्या मंदिर के बाद उन्होंने सर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट से फाइन आर्ट्स की पढ़ाई की. पढ़ाई के दौरान कई छोटी नौकरियां करनी पड़ीं. बाद में बैंक ऑफ इंडिया में क्लर्क की नौकरी मिली. दिन में बैंक, रात में पेंटिंग. 1967 में ताज आर्ट गैलरी में उनकी पहली सोलो प्रदर्शनी भी हुई.

पेंटिंग के साथ थिएटर ने रास्ता बदला. सत्यदेव दुबे जैसे गुरुओं के साथ काम करने के बाद अभिनय की समझ गहरी हुई. मराठी फिल्म बाजीरावचा बेटा से एक्टिंग की शुरुआत हुई. हिंदी सिनेमा का दरवाजा बसु चटर्जी की 'रजनीगंधा' से खुला. 1974 में आई यह फिल्म दो साल तक डिब्बे में पड़ी रही, फिर स्लीपर हिट बन गई.

जब अमिताभ-धर्मेंद्र-विनोद के दौर में अलग जगह बनाई

उस समय बॉक्स ऑफिस पर अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, विनोद खन्ना और शत्रुघ्न सिन्हा का जलवा था. शोले, दीवार जैसी फिल्में बड़े पर्दे पर राज कर रही थीं. ऐसे में अमोल पालेकर ने साधारण नौकरीपेशा युवक का चेहरा अपनाया. दर्शक उनमें खुद को देखने लगे. 'छोटी सी बात' में वे शर्मीले अरुण प्रदीप बने. फिल्म बॉक्स ऑफिस पर चली. इसके बाद चितचोर, घरौंदा, बातों बातों में, नरम गरम जैसी फिल्में आईं. गोलमाल में रामप्रसाद के दोहरे किरदार ने फिल्मफेयर बेस्ट एक्टर दिलाया. 

रजनीगंधा के संजय, छोटी सी बात के अरुण, चितचोर के विनोद, घरौंदा के सुदीप और गोलमाल के रामप्रसाद आज भी मध्यवर्गीय सपनों की कहानी लगते हैं. नौकरी, किराए का मकान, बस का सफर, पहली मोहब्बत और परिवार का दबाव. यही रोजमर्रा की जिंदगी अमोल पालेकर की फिल्मों का केंद्र थीं. बसु चटर्जी और ऋषिकेश मुखर्जी के सिनेमा ने उन्हें सही मंच दिया.

डायरेक्शन में भी आजामाया हाथ

अमोल पालेकर ने 1982 में मलयालम फिल्म 'ओलांगल' में भी काम किया. उन्होंने मराठी फिल्म 'आकृत' से निर्देशन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद 'थोड़ा सा रूमानी हो जाएं' और 'पहेली' जैसी हिंदी फिल्में बनाई. पहेली में शाहरुख खान, अमिताभ बच्चन और रानी मुखर्जी लीड रोल में थे. पहेली 2006 के ऑस्कर में 'बेस्ट फॉरेन फिल्म' कैटेगरी के लिए भारत की तरफ से आधिकारिक एंट्री थी. फिल्म फाइनल नॉमिनेशन तक नहीं पहुंच पाई.

बैंक से थिएटर और फिर हिंदी सिनेमा के केंद्र तक पहुंचना आसान नहीं था. अमोल पालेकर वह शख्स हैं जिन्होंने हिंदी सिनेमा के हीरो की परिभाषा ही बदलकर रख दी.

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