हिंदी सिनेमा में कुछ गाने ऐसे हैं, जिन्हें सुनते ही मन को सुकून मिलता है. इन गानों की खासियत है कि न तो इन्हें सुनने के लिए किसी खास मौके की जरूरत होती है और न ही किसी उम्र की. ऐसा ही एक सदाबहार गीत है ‘दिल कहे रुक जा रे रुक जा'. साल 1970 में आई फिल्म ‘मन की आंखें' का यह गाना आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में खास जगह रखता है. इस गीत को मोहम्मद रफी ने अपनी जादुई आवाज दी थी, जबकि पर्दे पर धर्मेंद्र और वहीदा रहमान की जोड़ी नजर आई थी. 56 साल पुराने इस गीत की मिठास आज भी बरकरार है. यही वजह है कि पुराने गानों के शौकीन लोगों के साथ-साथ नई पीढ़ी भी इसे सुनना पसंद करती है.
धर्मेंद्र और वहीदा रहमान पर फिल्माया गया था गाना
फिल्म ‘मन की आंखें' साल 1970 में रिलीज हुई थी. इसमें धर्मेंद्र और वहीदा रहमान मुख्य भूमिकाओं में थे. दोनों कलाकारों की शानदार अदाकारी और पर्दे पर उनकी केमिस्ट्री ने दर्शकों का ध्यान खींचा था. फिल्म का संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने तैयार किया था और इसके गीतों को साहिर लुधियानवी ने लिखा था.
‘दिल कहे रुक जा रे रुक जा' भी इसी फिल्म का एक यादगार गीत है. गाने में मोहम्मद रफी की आवाज का जादू सुनाई देता है. उनके गाने का अंदाज ऐसा था कि वह शब्दों के साथ भावनाओं को भी खूबसूरती से पेश करते थे. इस गीत को सुनते हुए एक अलग ही सुकून महसूस होता है. यही वजह है कि इतने साल बीत जाने के बाद भी यह गाना संगीत प्रेमियों की पसंद बना हुआ है.
झील और पहाड़ों के बीच गाने की खूबसूरती
इस गाने की लोकप्रियता में इसके फिल्मांकन का भी खास योगदान है. प्राकृतिक नजारों के बीच फिल्माया गया यह गीत अपने शांत और रोमांटिक अंदाज से लोगों का ध्यान खींचता है. झील, पहाड़ और खूबसूरत वादियों के बीच धर्मेंद्र का अंदाज गाने के मूड के साथ मेल खाता है. गीत के बोल भी ऐसे हैं, जो कुछ पल ठहरकर जिंदगी को महसूस करने का एहसास कराते हैं. भागदौड़ भरी जिंदगी में जब लोग सुकून के कुछ पल तलाशते हैं, तब ऐसे गाने मन को राहत देते हैं. मोहम्मद रफी की आवाज और संगीत का मेल इस गीत को खास बनाता है.
आज भी लोगों को पसंद आते हैं पुराने गाने
आज के दौर में संगीत सुनने का तरीका भले ही बदल गया हो, लेकिन पुराने हिंदी फिल्मी गानों का आकर्षण कम नहीं हुआ है. सोशल मीडिया और म्यूजिक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के दौर में भी लोग मोहम्मद रफी, किशोर कुमार और मुकेश जैसे गायकों के सदाबहार गीत सुनना पसंद करते हैं.
‘दिल कहे रुक जा रे रुक जा' भी ऐसा ही गीत है, जो पुरानी यादों को ताजा करने के साथ नई पीढ़ी को भी अपनी ओर खींचता है. धर्मेंद्र की स्क्रीन प्रेजेंस, वहीदा रहमान की खूबसूरती और रफी साहब की आवाज इस गाने को यादगार बनाती है. 56 साल बाद भी यह गीत बताता है कि अच्छा संगीत वक्त का मोहताज नहीं होता. कुछ गाने सिर्फ सुने नहीं जाते, बल्कि महसूस किए जाते हैं.
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