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54 साल पुराना वो गाना, जिसमें मां ने पहेली कहकर राजा बेटे को सुलाया, लता मंगेशकर की आवाज से बना अमर

साल 1972 में आई फिल्म अनुराग की सदाबहार लोरी 'मेरा राजा बेटा बूझे एक पहेली' ने भारतीय सिनेमा की बेहद भावुक गीतों में से एक माना है. इस लोरी को लता मंगेशकर और एस. डी. बर्मन ने मिलकर बॉलीवुड की सबसे भावुक और अमर लोरी के रूप में पहचान दिलाई थी.

54 साल पुराना वो गाना, जिसमें मां ने पहेली कहकर राजा बेटे को सुलाया, लता मंगेशकर की आवाज से बना अमर
54 साल पुराना वो गाना जो आज भी बच्चों के लिए है मां की फेवरिट लोरी
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हिंदी सिनेमा में मां बेटे के रिश्ते को हमेशा से बड़े ही भावुक तरीके से दिखाया गया है. 90 के दशक में रिलीज होने वाली कई मूवी में इन एहसासों को बेहद इमोशनल तरीके से फिल्माया गया है जो काफी पॉपुलर रहे है. इस दशक में रेडियो से लेकर टीवी पर बॉलीवुड फिल्मों के गानों ने दर्शकों को फिल्में देखने पर मजबूर किया. उस समय  सिनेमा ने हमें सैकड़ों लोरियां दी हैं, जो  समय  के साथ सीधे हमारी रूह में उतर गई और आज भी गुनगुनाने को मजबूर कर देती है. ऐसी ही एक मूवी  अनुराग जो  साल 1972 में आई  थी , जिसमें  एक ऐसी लोरी थी, जिसे गाने के रूप में इतना पसंद किया कि जो आज भी मां की ममता को बड़े प्यार से दर्शाता है. ये गाना है "मेरा राजा बेटा बूझे एक पहेली.  

बेटे को सुलाने की कोशिश करती मां पर बनी है ये लोरी

मेरा राजा बेटा बूझे एक पहेली अनुराग मूवी के उन बेहतरीन गानों में से एक मानी जाती है जो आज भी फैंस की जुबान पर सदाबाहर बने हुए है. गाने में जिस तरह नूतन अपने बेटे को बाहों में थामे, उसे सुलाने की कोशिश करती लेकिन उसे नींद नहीं आती है, और वह अपनी मां से वहीं पुरानी लोरी गाने को कहता है और जब मां गाती है, "प्यारी-प्यारी अखियों की कौन सहेली...", तो सुनने वाले की आंखें अपने आप नम हो जाती हैं.  नूतन के चेहरे के भाव और उनके अभिनय की सादगी ने इस गाने को अमर बना दिया.

इस लोरी को अमर बनाने में तीन दिग्गजों का अहम रोल है. आनंद बक्षी के गहरे शब्द, एस. डी. बर्मन का वो सुरमयी संगीत और इन सबसे बढ़कर जब सुर कोकिला लता मंगेशकर की मखमली आवाज से गाने रूप में निकले इस लोरी के सुर तो लगा  जैसे दुनिया का सारा शोर थम गया हो और केवल एक मां का आंचल अपने बच्चे को महफूज रख रहा हो.

यहां सुने ये लोरी

यह गाना कब गाया गया

फिल्म में नूतन एक विधवा मां (अनु राय) का किरदार निभाती हैं. उनका एक छोटा सा बेटा है जिसका नाम चंदन (मास्टर सत्यजीत) है. चंदन को ब्लड कैंसर है और वह जिंदगी की आखिरी घड़ियाँ गिन रहा है, जिसका नूतन को पता चल जाता है. एक मां होने के नाते, नूतन अपने मरते हुए मासूम बच्चे के दर्द को छुपाकर, उसे सुलाने के लिए यह लोरी गाती हैं.  गाना फिल्म में दो बार आता है- एक बार खुशी के माहौल में और एक बार बेहद दर्दभरे माहौल में Sad Version, जब बच्चा मौत के बेहद करीब होता है.

फिल्म में शिवानी (मौसमी चटर्जी), जो एक आश्रम में रहती है और जो दिखाई नहीं देता है, उसे मूर्तियां बनाने का शौक है, उसकी दोस्ती चंदन (सत्यजीत) नाम के एक लड़के से होती है, जिसे कैंसर होता है. शिवानी उसे अपना भाई बना लेती है. और चंदन उसे अपनी बड़ी बहन मानता है.  वही फिल्म में  विनोद खन्रा राजेश का किरदार निभा रहे थे, जो शिवानी से प्यार करते है और शादी करना चाहता है, लेकिन शिवानी के अंधेपन की वजह  राजेश के माता-पिता शादी  की इजाजत नहीं देते. वहीं  शिवानी को पता चलता है कि अगर कोई उसे अपनी आंखे दे तो वह वापस दुनिया देख सकेगी. ऐसे में जिंदगी की आखिरी लड़ाई लड़ रहे चंदन अपने मां बाप को  अपनी आखिरी इच्छा के तौर पर अपनी  आंखें शिवानी (बहन) को देने को कहता है. 

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