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51 साल पुराना गुलजार का वो गाना, जिसमें मिलता है पहाड़ों की ठंडी हवा जैसा सुकून, संजीव-शर्मिला की सादगी, भूपिंदर-लता की आवाज ने बनाया एवरग्रीन

51 साल पुराना एक ऐसा गीत, जो पहाड़ों की ठंडी हवाओं जैसा सुकून देता है. भूपिंदर-लता की आवाज और संजीव-शर्मिला की सादगी ने इसे हमेशा के लिए यादगार बना दिया.

51 साल पुराना गुलजार का वो गाना, जिसमें मिलता है पहाड़ों की ठंडी हवा जैसा सुकून, संजीव-शर्मिला की सादगी, भूपिंदर-लता की आवाज ने बनाया एवरग्रीन
51 साल से लोगों का फेवरेट है 'दिल ढूंढता है फिर वही' गाना

1975 में रिलीज हुई गुलजार की फिल्म मौसम का गीत ‘दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात-दिन' आज भी सुनने वालों को पहाड़ों की ठंडी हवा, शांत वादियों और बीते हुए सुकून भरे दिनों की याद दिलाता है. इस गीत को भूपिंदर सिंह और लता मंगेशकर ने आवाज दी थी. पर्दे पर संजीव कुमार और शर्मिला टैगोर की सादगी भरी जोड़ी ने इसे बेहद खूबसूरत बना दिया. गुलजार के बोल और मदन मोहन की धुन ने मिलकर ऐसा गीत रचा, जिसमें प्रेम के साथ-साथ पुरानी यादों की कसक भी महसूस होती है. यही वजह है कि 51 साल बाद भी यह गीत श्रोताओं के दिलों में बसा हुआ है.

गुलजार के बोलों में छिपा है बीते दिनों का सुकून

‘दिल ढूंढता है' सिर्फ एक रोमांटिक गीत नहीं, बल्कि उन दिनों की तलाश है जब जिंदगी भागदौड़ से दूर हुआ करती थी. गीत में फुर्सत के रात-दिन, खुले आसमान, पहाड़ों की वादियां और साथ बिताए शांत पलों की कल्पना की गई है. गुलजार ने प्रेम को बड़े संवादों या भारी-भरकम शब्दों के बजाय बेहद सहज और काव्यात्मक अंदाज में पेश किया.

इस गीत की एक खास बात यह है कि फिल्म में इसके दो अलग-अलग रूप सुनाई देते हैं. भूपिंदर सिंह का वर्जन फिल्म के शुरुआती क्रेडिट्स में सुनाई देता है, जबकि बाद में भूपिंदर सिंह और लता मंगेशकर की आवाज में इसका दूसरा वर्जन आता है. दोनों वर्जन का भाव एक जैसा होते हुए भी उनका मूड अलग है- एक में विरह और तलाश है, तो दूसरे में साथ होने की खुशी और पुरानी यादों की गर्माहट.

संजीव कुमार-शर्मिला टैगोर की सादगी ने जीता दिल

फिल्म में संजीव कुमार ने अमरनाथ और शर्मिला टैगोर ने चंदा का किरदार निभाया था. गीत के फिल्मांकन में दोनों की केमिस्ट्री किसी बनावटी रोमांस पर नहीं, बल्कि आंखों के भाव, मुस्कान और शांत साथ पर टिकी है. यही सादगी इस गाने को बाकी लव सॉन्ग्स से अलग बनाती है.

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मौसम का निर्देशन गुलजार ने किया था और फिल्म की कहानी प्रेम, पछतावे, बिछड़ने और भावनात्मक मुक्ति जैसे विषयों के इर्द-गिर्द घूमती है. शर्मिला टैगोर ने फिल्म में मां और बेटी की दोहरी भूमिका निभाई थी. उनके अभिनय को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का सम्मान मिला, जबकि मौसम को द्वितीय सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ.

मदन मोहन की आखिरी फिल्मों में शामिल था यह संगीत

मौसम के गीतों का संगीत मदन मोहन ने तैयार किया था और सभी गीत गुलजार ने लिखे थे. फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर की जिम्मेदारी सलिल चौधरी ने संभाली थी. मदन मोहन का 14 जुलाई 1975 को निधन हो गया था और फिल्म उनके निधन के कुछ महीनों बाद रिलीज हुई. इसी वजह से फिल्म के क्रेडिट्स में उन्हें श्रद्धांजलि दी गई थी. मौसम गुलजार और मदन मोहन की साथ में बनी सिर्फ दो फिल्मों में से एक थी. दूसरी फिल्म कोशिश थी. फिल्म मौसम को बॉक्स ऑफिस पर सिल्वर जुबली हिट बताया गया है.

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