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ऊंची इमारतें छीन रही हैं बच्चों का बचपन, डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ की रिपोर्ट कर देगी हैरान

आप खुद को आज के बच्चों के साथ कंपेयर करेंगे तो आपको नजर आएगा की कैसे समय के साथ दुनिया में तेजी से फैलते शहर बच्चों के लिए सिकुड़ते जा रहे हैं. बड़ी-बड़ी इमारतें तो बन गई हैं लेकिन बच्चों की दुनिया इन इमारतों के बीच छोटी होती जा रही है. 

ऊंची इमारतें छीन रही हैं बच्चों का बचपन, डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ की रिपोर्ट कर देगी हैरान
बड़ी बिल्डिंगों के बीच सिकुड़ता बचपन.

Kids Care: क्या आपको अपना बचपन याद है? जब आप स्कूल से आने के बाद आप अपना काम खत्म कर के खेलने निकल जाते थे. बड़ी-बड़ी जगहों पर आप अपने दोस्तों के साथ कई गेम खेलते थे. तब ना तो समय की कमी थी, ना जगह की और ना ही लोगों की. लेकिन अगर आप खुद को आज के बच्चों के साथ कंपेयर करेंगे तो आपको नजर आएगा की कैसे समय के साथ दुनिया में तेजी से फैलते शहर बच्चों के लिए सिकुड़ते जा रहे हैं. बड़ी-बड़ी इमारतें तो बन गई हैं लेकिन बच्चों की दुनिया इन इमारतों के बीच छोटी होती जा रही है. 

बता दें कि इन सबके बीच और बच्चों के लिए छोटी होती इस दुनिया को लेकर के विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ), यूनिसेफ और संयुक्त राष्ट्र पर्यावास एजेंसी ने एक नई वैश्विक गाइड जारी की है. जिसमें शहरों को इस तरह से बसाने और बनाने की बात कही गई है जो बच्चों के लिए भी हों. इस गाइड में सरकारों और नेताओं से रिक्वेस्ट की गई है कि जब वो किसी शहर को बसाने और उसके विकास से जुड़ी प्लैनिंग करते हैं तो ऐसे में बच्चों को भी ध्यान में रखें. क्योंकि खुला माहौल बच्चों के स्वास्थ्य, विकास और बेहतर भविष्य के लिए बेहद जरूरी है.

इस गाइड में बताया गया है कि अगर शहरों के विकास के लिए उनकी डिजाइनिंग में पार्क, खुली सड़कें और खुले मैदान बच्चों को सुरक्षित तरीके से चलने, खेलने, सीखने और प्रकृति से जुड़ने का मौका देते हैं. इसके साथ ही इस तरह से बनाए गए शहर जलवायु और हवा को भी शुद्ध बनाए रखने में मदद करते हैं. 

बढ़ते शहरों में सिमट रहा है बचपन

विश्व स्तर पर बात की जाए तो महज 44 फीसदी शहरी आबादी ही किसी खुले सार्वजनिक स्थान के पास रहती है. वहीं जो देश कम और मध्यन आय वाले हैं वहां पर हालात कहीं ज्यादा खराब हैं. इन आंकड़ों से अगर अंदाजा लगाया जाए तो लाखों बच्चे ऐसे शहरों में रह रहे हैं, जहां उनके पास खेलने या खुलकर सांस लेने के लिए भी प्रॉपर और सेफ जगह नहीं है. आज के समय में बढ़ता प्रदूषण, तेजी से बढ़ता ट्रैफिक, लोगों की भीड़ और जलवायु से जुड़ी आपदाएं बच्चों की आजादी और विकास को लगातार सीमित कर रही हैं. 

डब्ल्यूएचओ के स्वास्थ्य निर्धारक, संवर्धन और रोकथाम विभाग के निदेशक डॉक्टर एटियेन क्रूग का प्रेस रिलीज में कहा, “सुरक्षित और समावेशी सार्वजनिक स्थान तक पहुंच बच्चों के स्वास्थ्य, विकास, सीखने और सामाजिक रिश्तों से सीधे जुड़ी है. यह बच्चों का अधिकार है."

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बच्चों के लिए शहर बनाने की राह

‘गाइड टू क्रिएटिंग अर्बन पब्लिक स्पेसेज फॉर चिल्ड्रन' में सरकारों, शहरी योजनाकारों को ऐसी जगहें बनाने के लिए मदद करेंगी जो बच्चों के लिए अनुकूल हों. ये वैश्विक शोध, एक्सपर्ट्स की राय, बच्चों से हुई बातचीत और अलग-अलग देशों के शहरी अनुभवों पर बेस्ड है.

डब्ल्यूएचओ की तकनीकी प्रमुख (अर्बन हेल्थ) डॉक्टर नाथाली रोबेल का कहना है, “यह गाइड दिखाती है कि बच्चों को केंद्र में रखकर बनाए गए शहर न सिर्फ खेलने के अधिकार को पूरा करते हैं, बल्कि 2030 तक सभी के लिए सुरक्षित और सुलभ सार्वजनिक स्थानों के लक्ष्य को भी तेजी से आगे बढ़ा सकते हैं."

शहरी विकास में पीछे हो रहे बच्चे

आंकड़े की मानें तो आज दुनिया के 55 फीसदी आबादी शहरों में रह रही है, जो आने वाले समय में 2025 तक लगभग 68 फीसदी तक पहुंच सकती है. ऐसे में सबसे ज्यादा विकास उन देशों में होगा जो विकासशील हैं. यानी आने वाले सालों में ये शहर तय करेंगे कि करोड़ों बच्चों का बचपन कैसा होगा.

बता दें कि आज लिए गए फैसले ही आने वाले समय में बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने में मदद करेगा.

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