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Parenting Tips: स्क्रीन टाइम से ज्यादा खतरनाक है नो टॉक टाइम, जानिए क्या है ये और बच्चों पर कैसे असर डालता है

Parenting Mistakes: बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम से भी ज्यादा खतरनाक एक और चीज है, जिसे हम अक्सर नजरअदाज कर देते हैं, नो टॉक टाइम. यानी वह समय जब माता-पिता और बच्चों के बीच बातचीत ही नहीं होती.

Parenting Tips: स्क्रीन टाइम से ज्यादा खतरनाक है नो टॉक टाइम, जानिए क्या है ये और बच्चों पर कैसे असर डालता है
Parenting Tips: यह वह समय है जब माता-पिता और बच्चों के बीच बातचीत ही नहीं होती.

Parenting Tips: आज के डिजिटल दौर में बच्चों की परवरिश को लेकर सबसे बड़ा डर स्क्रीन टाइम को माना जाता है. मोबाइल, टैबलेट और टीवी को लेकर माता-पिता अक्सर चिंतित रहते हैं कि कहीं बच्चे इनका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल तो नहीं कर रहे. लेकिन, एक्सपर्ट्स का कहना है कि बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम से भी ज्यादा खतरनाक एक और चीज है, जिसे हम अक्सर नजरअदाज कर देते हैं, नो टॉक टाइम. यानी वह समय जब माता-पिता और बच्चों के बीच बातचीत ही नहीं होती.

क्या है नो टॉक टाइम?

नो टॉक टाइम का मतलब है घर में एक ही छत के नीचे रहते हुए भी माता-पिता और बच्चों के बीच भावनात्मक और संवाद की दूरी होना. खाना खाते समय, स्कूल से आने के बाद या सोने से पहले जब बातचीत होनी चाहिए, तब सब अपने-अपने मोबाइल या काम में व्यस्त रहते हैं. बच्चे सवाल पूछना चाहते हैं, अपनी बातें शेयर करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें सुनने वाला कोई नहीं होता.

क्यों है नो टॉक टाइम ज्यादा खतरनाक?

स्क्रीन टाइम को सीमित किया जा सकता है, लेकिन अगर बच्चे के मन में बातें दबती चली जाएं तो उसका असर लंबे समय तक रहता है. बातचीत न होने से बच्चे खुद को अकेला और अनसुना महसूस करने लगते हैं. धीरे-धीरे वे माता-पिता से दूरी बनाने लगते हैं और अपनी भावनाएं शेयर करना बंद कर देते हैं.

बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर

नो टॉक टाइम बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को चुपचाप नुकसान पहुंचाता है. ऐसे बच्चे ज्यादा चिड़चिड़े हो सकते हैं, आत्मविश्वास की कमी महसूस करते हैं, अपनी भावनाएं पहचानना और व्यक्त करना नहीं सीख पाते, तनाव और एंग्जायटी का शिकार हो सकते हैं. जब बच्चों को घर में सुना नहीं जाता, तो वे बाहर गलत जगहों पर समझ और अपनापन ढूंढने लगते हैं.

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रिश्तों पर पड़ता है गहरा असर:

बचपन में माता-पिता से हुई बातचीत ही बच्चों की इमोशनल नींव बनाती है. नो टॉक टाइम के कारण माता-पिता और बच्चों के बीच भरोसे की कमी आने लगती है. किशोरावस्था में यही दूरी और बढ़ जाती है, जिससे माता-पिता को बच्चों की जिंदगी में चल रही बातों की जानकारी ही नहीं रहती.

सीखने और सोचने की क्षमता पर प्रभाव

बातचीत बच्चों की सोचने, सवाल करने और निर्णय लेने की क्षमता को मजबूत बनाती है. जब संवाद नहीं होता, तो बच्चों की भाषाई क्षमता और क्रिटिकल थिंकिंग पर भी असर पड़ता है. वे अपनी बात ठीक से रखना नहीं सीख पाते.

क्या करें माता-पिता?

  • नो टॉक टाइम को खत्म करना मुश्किल नहीं है, बस थोड़ी-सी जागरूकता चाहिए.
  • रोज कम से कम 15–20 मिनट बच्चों के साथ बिना फोन के बिताएं.
  • उनके दिन के बारे में पूछें और ध्यान से सुनें.
  • गलती पर तुरंत डांटने की बजाय समझने की कोशिश करें.
  • सोने से पहले बातचीत को आदत बनाएं.
  • बच्चों की भावनाओं को हल्के में न लें.

स्क्रीन नहीं, कनेक्शन जरूरी है

बच्चों के लिए सबसे जरूरी चीज मोबाइल से दूरी नहीं, बल्कि माता-पिता से नजदीकी है. जब घर में बातचीत होती है, तो स्क्रीन अपने-आप सीमित हो जाती है. बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं.

स्क्रीन टाइम से डरना जरूरी है, लेकिन नो टॉक टाइम को नजरअंदाज करना और भी खतरनाक है. बच्चों को सबसे ज्यादा जरूरत सुनने वाले कानों और समझने वाले दिल की होती है.

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