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अब दूर के नहीं रहे चंदा मामा, बचपन में पढ़े-सुने चांद के चार किस्से जो आज हर 90s किड को याद आ रहे हैं...

NASA Artemis 2 Mission 2026 and Chanda Mama Stories: 54 साल बाद इंसानों की चांद की पहली यात्रा की शुरुआत 2 अप्रैल की सुबह 3:50 बजे विशाल SLS रॉकेट ने धरती से आसमान की ओर उड़ान भरने से हुई है... ऐसे में सिर्फ विज्ञान ही नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की स्मृतियों का 'चंदा मामा' भी एक बार फिर चर्चा में आ गया.

अब दूर के नहीं रहे चंदा मामा, बचपन में पढ़े-सुने चांद के चार किस्से जो आज हर 90s किड को याद आ रहे हैं...
NASA Artemis 2: अब दूर के नहीं रहे चंदा मामा, याद आए बचपन के वो 4 मशहूर किस्से. (AI Generated image)

NASA Artemis 2 Mission 2026 and Chanda Mama Stories: आज का दिन बेहद खास है. खासकर उन लोगों के लिए जो रोज आसमान की तरफ देखते हैं और सोचते हैं कि इसके पार कैसी दुनिया होगी, पृथ्वी की परिधि से परे मंगल ग्रह कैसा होगा, चांद पर जाकर कैसा लगता होगा. चांद हमारे जीवन में बेहद अलग जगह रखता है. यूं कह लें कि गोस्वामी तुलसीदास की यह चौपाई 'जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी' चांद पर भी एकदम फिट बैठती है. क्योंकि बच्चों के लिए वह मामा है, प्यार में पड़े जोड़ों के लिए वह या तो उनका प्रेमी है या फिर एक मैसेंजर, एक ज्योतिष के लिए चांद गाइड है, एक भौगोलिक वैज्ञानिक के लिए वह जिज्ञासा है. 

क्यों मां को चांद में मामा ही दिखे चाचा या दादा नहीं

सोचती हूं कि जब कभी पहली बार कोई नन्हा बच्चा रोया होगा, तो शायद नींद में चूर एक मां ने रात के अंधेरे में चमकते चांद में अपने भाई जैसा सहारा, उम्मीद और ठंडक पाकर ही उसे चंदा मामा का नाम दिया होगा. और मामा जैसी शैतानी के किस्से उसके आसपास गढ़े होंगे, जिन्होंने बच्चों में भी जिज्ञासा जगाई होगी. एक ओर जहां चांद मां के मन को ठंडक देता होगा वहीं बच्चे को नानी के घर का सुकून भी महसूस कराता होगा. है न! 

हो तो ये भी सकता है कि रात में जब बच्चे के बिलखने से परेशान मां को घर के आंगन की, वहां के सुकून की और बेफिक्र नींद की याद आई हो, तो उसने इसी चांद की सैर कर खुद को और बच्चे को मायके के या यूं कह लें कि मामा के ठंडे आंगन में उतार दिया हो. और जब वह ख्यालों से बाहर आई हो तो उसे एहसास हुआ हो कि वास्तविक जीवन में तो 'चंदा मामा दूर के' हैं.

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सैकड़ों साल बाद, दूर के नहीं रहे चंदा मामा

फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर से भारतीय समयानुसार सुबह 3:50 बजे विशाल SLS नाम के इस शक्तिशाली रॉकेट ने धरती से आसमान की ओर उड़ान भर ली है. यह 54 साल बाद इंसानों की चांद की पहली यात्रा है. ऐसे में सिर्फ विज्ञान ही नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की स्मृतियों का 'चंदा मामा' भी एक बार फिर चर्चा में आ गया. 

चंदा मामा से मिलने जा रहे हैं ये 4 लोग

तकरीबन हर बच्चा रात को छत या बालकनी से चंदा मामा को देखकर सोचता था कि इनसे मिल लूं कितने मजे आएंगे. इस मिशन में चार अंतरिक्ष यात्री रीड वाइसमैन, विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टीना कोच और जेरेमी हैनसेन चंदा मामा से मिलने जा रहे हैं. ये चारों ओरियन कैप्सूल में बैठकर चांद के पास जाएंगे.

खबर पढ़ें : 50 साल बाद चांद की ओर उड़ान, NASA ने लॉन्च किया आर्टेमिस 2 मिशन

हमारे अपने चंदा मामा...

भले ही नासा के चार अंतरिक्ष यात्री अब चांद के करीब जाकर वैज्ञानिक रहस्यों की परतें खोलेंगे, लेकिन हमारे लिए चांद हमेशा से प्रयोगशाला से ज्यादा 'कहानियों का पिटारा' रहा है. आइए, आर्टेमिस की इस ऐतिहासिक सफलता के बीच, चांद से जुड़े उन चार किस्सों और कविताओं की सैर करते हैं जिन्होंने हमारे बचपन को संवारा है:

चंदा मामा दूर के... और वो पुए पकाना

"चंदा मामा दूर के पूए पकाएँ बूर के,
आप खाएँ थाली में मुन्ने को दें प्याली में,
प्याली गई टूट, मुन्ना गया रूठ,
लाएँगे नई प्यालियाँ बजा बजा के तालियाँ,
मुन्ने को मनाएँगे हम दूध मलाई खाएँगे"

शायद ही कोई भारतीय ऐसा होगा जिसने बचपन में मां की गोद में बैठकर यह कविता (Chanda Mama Stories) न सुनी हो. यह कविता सिर्फ एक तुकबंदी नहीं, बल्कि चांद के प्रति हमारे अपनापन और अपनत्व का प्रतीक है. दुनिया के लिए चांद एक 'खगोलीय पिंड' (Celestial Body) हो सकता है, पर हमारे लिए वह हमेशा से परिवार का एक सदस्य रहा है- एक ऐसा 'मामा' जो रात भर जागकर अपनी चांदनी से हमें थपकियां देता है.

'चांद का कुर्ता' और रामधारी सिंह दिनकर

बचपन की पाठ्यपुस्तकों में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की यह कविता चांद के 'घटने-बढ़ने' के विज्ञान को बड़ी मासूमियत से समझाती है. 

"हट कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला, सिलवा दो मां मुझे ऊन का, एक झिंगोला..."

चांद अपनी मां से जिद करता है कि उसे ठंड लगती है, इसलिए उसे कुर्ता चाहिए. लेकिन मां परेशान है क्योंकि वह कभी अंगुल भर चौड़ा होता है तो कभी फुट भर लंबा. यह कविता हमें सिखाती है कि चांद हमारे लिए सिर्फ एक निर्जीव पत्थर नहीं, बल्कि एक जिद्दी और प्यारा बच्चा भी है.

दादी मां और चरखा कातती बुढ़िया

टेलीस्कोप और हाई-डेफिनिशन कैमरों के आने से पहले, हम सबके पास अपनी एक 'ज़ूम लेंस' वाली कल्पना थी. पूर्णिमा के चांद पर दिखने वाले धब्बों को देखकर हर घर में एक कहानी सुनाई जाती थी- "चांद पर बैठी एक बुढ़िया जो चरखा कात रही है."

माना जाता था कि वह बुढ़िया वहां बैठकर शांति का धागा बुनती है. आर्टेमिस 2 के अंतरिक्ष यात्री भले ही वहां क्रेटर (Craters) और धूल ढूंढें, पर हम आज भी वहां उस सुकून भरे 'चरखे' की कल्पना करना पसंद करते हैं.

'ईद का चांद' और प्रेमचंद की 'ईदगाह'

साहित्य में चांद सिर्फ बचपन की लोरी नहीं, बल्कि उम्मीद और उल्लास का भी प्रतीक रहा है. मुंशी प्रेमचंद की कहानियों में जब 'ईद का चांद' नजर आता है, तो वह पूरे समाज के लिए खुशियां और हामिद जैसे बच्चों के लिए मेलों की उम्मीद लेकर आता है. 

"सूरज तो आग का गोला है, पर चांद वह शीतल मरहम है जो दिन भर की थकान के बाद सबको एक जैसा सुकून देता है."

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विज्ञान और कल्पना का मिलन

आज जब नासा का ओरियन कैप्सूल चांद की कक्षा की ओर बढ़ रहा है, तो यह देखना सुखद है कि मानव की जिज्ञासा और कल्पना एक ही बिंदु पर मिल रहे हैं. 

चांद पर जाने वाले यात्री भले ही वहां ऑक्सीजन और पानी की खोज करें, पर धरती पर बैठा हर वो इंसान जो आज भी अपनी खिड़की से चांद को निहार रहा है, वह उसी 'चंदा मामा' से अपनी पुरानी जान-पहचान ताज़ा कर रहा है. 

आर्टेमिस 2 की इस उड़ान के साथ, हमारे बचपन की उन कहानियों को भी आज नए पंख मिल गए हैं!

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