मैं श्रुति हूं, उम्र 30 साल. मेरी सुबह हमेशा मोबाइल के अलार्म से शुरू होती थी. तेज़ आवाज़, बार-बार स्नूज़, और हर दिन एक ही स्ट्रगल कि उठूं या 5 मिनट और सो जाऊं. धीरे-धीरे ये आदत इतनी नॉर्मल लगने लगी थी कि मैंने कभी सोचा ही नहीं कि इसके बिना भी दिन शुरू हो सकता है. लेकिन सच ये है कि हर सुबह मैं पहले से ही थकी हुई महसूस करती थी, जैसे नींद पूरी ही नहीं हुई हो.एक दिन मैंने फैसला किया कि 60 दिन तक बिना मोबाइल अलार्म के उठकर देखूंगी. शुरुआत में ये आइडिया थोड़ा अजीब लगा, क्योंकि डर था कि कहीं देर से न उठ जाऊं. लेकिन मैंने सोने का टाइम फिक्स किया और खुद से वादा किया कि इस एक्सपेरिमेंट को सीरियसली फॉलो करूंगी.
पहले कुछ दिन गड़बड़ी से भरे रहे
पहले कुछ दिन काफी अनिश्चित रहे. कभी मैं बहुत जल्दी उठ जाती थी, तो कभी थोड़ा लेट. लेकिन सबसे बड़ा फर्क ये था कि अब नींद खुद-ब-खुद खुल रही थी. किसी तेज़ आवाज़ के झटके से टूट नहीं रही थी. ये सच है कि शुरुआत में शरीर थोड़ा कन्फ्यूज था, लेकिन धीरे-धीरे उसने अपना पैटर्न सेट करना शुरू कर दिया. करीब एक हफ्ते बाद मैंने नोटिस किया कि मैं बिना किसी अलार्म के लगभग एक ही समय पर उठने लगी हूं. ये मेरे लिए बहुत नया अनुभव था. अब सुबह उठते ही वो भारीपन और चिड़चिड़ापन नहीं होता था. दिमाग ज्यादा क्लियर लगता था.
धीरे-धीरे रूटीन सेट होने लगा
दूसरे हफ्ते से मेरी रात की नींद भी बेहतर होने लगी. पहले मैं देर तक मोबाइल स्क्रॉल करती रहती थी, लेकिन जब अलार्म हटाया तो मुझे खुद ही जल्दी सोने की जरूरत महसूस हुई. स्क्रीन टाइम कम हुआ और नींद गहरी होने लगी. तीसरे-चौथे हफ्ते तक पहुंचते-पहुंचते मेरा पूरा रूटीन बदल गया. सुबह उठने के बाद अब मैं बिना जल्दबाजी के दिन की शुरुआत करती थी. पहले जहां सब कुछ भाग-दौड़ में होता था, अब थोड़ा समय खुद के लिए मिलने लगा. हल्की एक्सरसाइज, थोड़ा वॉक, और कभी-कभी सिर्फ शांति से बैठना, ये सब मेरी सुबह का हिस्सा बन गया.
सुस्ती गॉन, एनर्जी ऑन
सबसे बड़ा बदलाव मेरी एनर्जी और मूड में आया. दिनभर में जो सुस्ती और इरिटेशन रहता था, वो काफी कम हो गया. अब मुझे दोपहर में भी फ्रेश फील होता था, जो पहले शायद ही कभी होता था. करीब 45 दिन बाद मुझे ये भी महसूस हुआ कि अब मेरा शरीर खुद ही सही टाइम पर सोने का सिग्नल देने लगा है. बिना अलार्म के उठना अब कोई चैलेंज नहीं रह गया था, बल्कि एक नेचुरल आदत बन गई थी.
60 दिन पूरे होने तक मैंने समझ लिया कि अलार्म सिर्फ हमें जगाता है, लेकिन हमारा शरीर खुद भी जाग सकता है अगर हम उसे सही रूटीन दें. इस छोटे से बदलाव ने मेरी पूरी लाइफस्टाइल पर असर डाला. अब मैं अलार्म का इस्तेमाल सिर्फ इमरजेंसी में करती हूं. बाकी दिनों में मैं अपने शरीर की नेचुरल क्लॉक पर भरोसा करती हूं. और सच कहूं, तो ये बदलाव मेरे लिए किसी भी मोटिवेशनल टिप से ज्यादा असरदार साबित हुआ.
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