2 मार्च, 2026, रात के 11:45 बज रहे हैं...
प्यारी डायरी,
सच बताऊं तो आज लग रहा है कि बस सो जाऊं और सीधे रिजल्ट वाले दिन जागूं. आज मैथ्स का पेपर था. सुबह जब अलार्म बजा, तो मन किया कि चादर तान के सोई रहूं, पर मम्मी की आवाज़ और उस दही-चीनी वाले शगुन ने बेड से खींच ही लिया.
सेंटर के बाहर का सीन तो मत ही पूछो! आधे दोस्त ऐसे थे जो 'भाई कुछ नहीं पढ़ा' बोलकर भी पन्ने पलट रहे थे, और कुछ ऐसे जो एकदम स्टैच्यू बने हुए थे. मुझे तो बस अपनी हार्टबीट सुनाई दे रही थी. पर पता है क्या? जैसे ही वो क्वेश्चन पेपर हाथ में आया और पहला सवाल देखा जो मुझे आता था, आधी जान तो वहीं वापस आ गई.
पूरे तीन घंटे बस पेन चलता रहा. वो सप्लीमेंट्री शीट मांगते वक्त जो थोड़ी सी 'प्रो' वाली फीलिंग आती है न, बस वही एक मोटिवेशन था. हालांकि, एक 4 नंबर वाला सवाल अटक गया, जिसका मलाल अभी भी है. घर आकर जब दोस्तों से डिस्कस किया तो लगा कि शिट! वो तो आता था, बस सिली मिस्टेक हो गई. पर अब क्या कर सकते हैं, जो गया वो गया.

पापा ने आज टोकना छोड़ दिया है. बस आते-जाते सिर पर हाथ फेर देते हैं, शायद वो भी मेरा स्ट्रेस समझ रहे हैं. पर घर में जो ये सन्नाटा पसरा रहता है न, वो कभी-कभी डरा देता है. ऐसा लगता है जैसे मैं किसी मिशन पर हूं और पूरा घर मेरे लिए सांसें रोके खड़ा है.
अब कल की छुट्टी है, पर कहने को ही छुट्टी है. कल पूरा दिन वो केमिस्ट्री के रिएक्शंस और फिजिक्स के लंबे-चौड़े फॉर्मूले चाटने हैं. कभी-कभी लगता है कि क्या ये सब सच में लाइफ में काम आएगा? पर फिलहाल तो ये मार्कशीट ही दुनिया है.
आंखें जल रही हैं, पर नींद गायब है. चाय का तीसरा कप पास में रखा है. बस ये कुछ दिन और... फिर चैन की नींद सोऊंगी.
चलो, अब सो जाती हूं वरना कल सुबह रिवीजन नहीं हो पाएगी.
गुड नाईट.
(त्त्विशा दसवीं की छात्रा हैं और दिल्ली में रहती हैं.)
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