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Doosre se Homework Karane Wale Bachhe Ki Diary: दो पन्‍नों के होमवर्क के बदले मां ने दो घंटे घुमाया, फि‍र मुंह में नहीं जहन में भी घुला केर सांगरी का स्वाद

'कैर हरे रंग की होगी, बेर जैसी, ध्यान से तोड़ना कांटे वाले झाड़ पर लगती है, कांटे चूभे तो चांटे पड़ेंगे' 'सांगरी का पेड़ फलाने मामा के खेत में है' 'वो लंबी सी फली होती है, हरी-हरी, पतली-पतली' देखो बबूल की फली न ले आना, वो बबूल की फली से जरा छोटी और हरी होगी...' 

Doosre se Homework Karane Wale Bachhe Ki Diary: दो पन्‍नों के होमवर्क के बदले मां ने दो घंटे घुमाया, फि‍र मुंह में नहीं जहन में भी घुला केर सांगरी का स्वाद

Doosre se Homework karane wale bachche ki Diary: मेरी प्‍यारी डायरी, क्‍या तुम्‍हें दो महीने की वो छुट्टियां याद हैं, जिनमें होमवर्क तो दो महीने का होता था, पर किया एक ही हफ्ते में जाता था. मामा, चाचा, दीदी, बुआ और हां, गुस्सा हुई मां की मदद से... सब उल्टे हाथ से लिखते थे ताकि मेरी लिखाई से मैच कर सकें और इसके बदले में मुझे सीधे हाथ से जाने क्या-क्या करवाया जाता था... कुछ चौथी क्लास की बात है शायद ये, इसी काम के बदले मुझसे दो माओं ने (मेरी मां और उनकी मां) एक ऐसा काम करवाया, जो भूले नहीं भूलता... 

आजकल जहां हम बच्चों को गर्मी में बाहर नहीं निकलने देते, उन दोनों ने मुझे भरी गर्मी में भेज दिया वणी (छोटा वन) में. आदेश था- ''जब तक काम होगा, तुम्हें वणी जाकर सांगरी और कैर लानी होगी.'' मेरे मुंह से निकला 'तौबा, अब यह क्या है.' इस नन्हें से सवाल के जवाब कई ऑप्शन्स में मिले.

'कैर हरे रंग की होगी, बेर जैसी, ध्यान से तोड़ना कांटे वाले झाड़ पर लगती है, कांटे चूभे तो चांटे पड़ेंगे' 'सांगरी का पेड़ फलाने मामा के खेत में है' 'वो लंबी सी फली होती है, हरी-हरी, पतली-पतली' देखो बबूल की फली न ले आना, वो बबूल की फली से जरा छोटी और हरी होगी...' 

कसम से कुछ पल्ले न पड़ा. थैला हाथ में लिए मैं और छोटी बहन राखी निकल पड़े. रास्ते में कैर और सांगरी की चोरी की प्लॉनिंग-प्लॉटिंग की गई. यह भी तय किया गया क‍ि घर पहुंचते-पहुंचते हम अपने कपड़ों को फाड़ देंगे, ताक‍ि मेहनत देखकर घर वाले हमें ये नई चीज सबसे ज्यादा दें. जैसे-तैसे रेत के टीलों को पार कर, एक के बाद एक कई खेतों की मेढ़ों से कूद कर कैर और सांगरी घर पर छोला भर पहुंचा दिए गए. प्लान के मुताबिक कपड़े भी फटे हुए मिले और उनके चेहरों से ये अंदेशा भी क‍ि यह चीज हमें सबसे ज्यादा मिलेगी. 

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मां और नानी के चेहरे पर गजब की चमक थी. खासकर मां के चेहरे पर, क्योंकि उसे तो नानी से अचार ड़लवा कर यहां दिल्ली जो लाना था. खैर नानी ने मां के लिए आचार बनाया और सबके लिए कैर-सांगरी की वो लजीज सब्ज‍ी जिसका स्वाद आज भी याद आ जाए तो मुंह में इतना पानी आ जाता है क‍ि सौ देशों का सूखा एक साथ खत्म कर दे... खैर, दिन भर दौड़ भाग करने वाले उन नन्हें कदमों की थकान को जीभ की तृप्त‍ि और पेट के भारीपन ने पल भर में नींद दिला दी थी... 

कैर सांगरी वैसे तो राजस्थानी डिश है, लेकिन हर‍ियाणा के उन भागों में खूब बनाई और परोसी जाती है जिन्हें बागड़ (रेतीला इलाका) कहा जाता है. यानी जो राजस्थान की सीमा के आसपास के इलाके हैं. बड़े होने पर देखा क‍ि अब इसे ब्याह शादियों में परोसा जाने लगा है, माने यह अब एक शाही सब्जी बन चुकी है... 

सांगरी की फली खेजड़ी के पेड़ पर लगती है, जो पेड़ों की समझ न रखने वालो को बबूल जैसा दिख सकता है. वहीं, कैर एक झाड़ीदार पौधे पर लगते हैं, जो कांटों वाला होता है. कई बार कैर कड़वे भी हो सकते हैं, इसलिए उन्हें बनाने से पहले नमक के पानी या झाझ में रात भर या 4-5 घंटे भीगो लिया जाता है. 

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Photo Credit: image: whiskaffair.com

कैर सांगरी की सब्जी

  1. भीगी कैर सांगरी को उबाल लें. एक सीटी के बाद गैस धीमी कर दें और 2-3 मिनिट उबलने दें. अब कैर सांगरी को पानी से अलग कर लें. साफ पानी से 1-2 बार धो लें. 
  2. कढ़ाई में तेल या देसी घी डालकर जीरे, हींग का तड़का लगाएं. फिर हल्दी पाउडर, धनियां पाउडर, साबुत लाल मिर्च ड़ालकर भून लें. अब इसमें उबले हुए कैर सांगरी डालें. ऊपर से लाल मिर्च पाउडर, अमचूर पाउडर, गरम मसाला, नमक और किशमिश डालें. 
  3. मसाला और ड्राई फ्रूट्स डालने के बाद सब्जी को 3-4 मिनिट तक पकाएं. सब्जी तैयार है. 
  4. थोड़ा सा हरा धनियां डालें और पूरी या परांठे के साथ गर्मागरम परोसें. 

खास बात- 

  • यह सब्जी जल्दी खराब नहीं होती इसलिए इसे फ्रिज में रखकर 3-4 दिन तक खाया जा सकता है.
  • कैर और सांगरी को सुका कर पूरे साल इसके स्वाद का लुत्फ उठाया जा सकता है. 
  • जब सांगरी पकने के बाद पेड़ से गिर जाती हैं, इसे खोखा कहा जाता है. 
  • कैर सांगरी पेट के लिए बहुत फायदेमंद होती है. 

- आपकी अनिता

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