अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की रिपोर्ट ‘भारत में कामकाज की स्थिति-2026' के अनुसार देश में 20 से 29 वर्ष आयु वर्ग के 6.3 करोड़ ग्रेजुएट्स में से 1.1 करोड़ बेरोजगार हैं. ग्रेजुएट होने के एक साल के अंदर बहुत ही कम लोगों को निश्चित वेतन वाली जॉब मिल पाती है. इस रिपोर्ट में पाया गया कि बेरोजगार के रूप में पंजीकरण कराने के एक साल के भीतर केवल करीब 7 प्रतिशत ग्रेजुएट्स को स्थायी वेतन वाली नौकरी मिल पाती है. रिपोर्ट में कहा गया कि ग्रेजुएट बेरोजगारी दर उच्च बनी हुई है. 15 से 25 वर्ष आयु वर्ग में बेरोजगारी दर करीब 40 प्रतिशत और 25 से 29 वर्ष आयु वर्ग में 20 प्रतिशत है. इसमें कहा गया,‘‘ ग्रेजुएट होने के एक वर्ष के अंदर केवल एक छोटा हिस्सा ही स्थायी वेतन वाली नौकरी हासिल कर पाता है. हाल के सालों में ग्रेजुएट्स की बढ़ती संख्या के कारण यह समस्या और बढ़ गई है.''
युवा ग्रेजुएट्स की कुल संख्या में वृद्धि हुई
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ दशकों में युवा आबादी में काफी वृद्धि हुई है और उच्च शिक्षा में नामांकन दर भी बढ़ी है. जिससे युवा ग्रेजुएट्स की कुल संख्या में वृद्धि हुई है. इसमें कहा गया, ‘‘इस स्थिति से उच्च बेरोजगारी दर के साथ बेरोजगार ग्रेजुएट्स की संख्या भी बढ़ गई है. 2023 तक 20 से 29 वर्ष आयु वर्ग के 6.3 करोड़ ग्रेजुएट्स में से 1.1 करोड़ बेरोजगार थे.''
युवा ग्रेजुएट्स के लिए बेरोजगारी दर लगातार ऊंची बनी हुई है. शिक्षा तक पहुंच असमान है. हालांकि स्कूल से कार्यस्थल तक का सफर अनिश्चित है और कई लोगों के लिए यह स्थायी, लाभकारी रोजगार में तब्दील नहीं हो पाता.''
रिपोर्ट कहती है, पिछले चार दशक में युवाओं की शिक्षा के स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और उच्च शिक्षा में नामांकन दर 28 प्रतिशत तक पहुंच गई है. जिसमें महिलाओं की भागीदारी खासतौर पर बढ़ी है. हालांकि, पुरुषों के नामांकन में गिरावट दर्ज की गई है. यह 2017 के 38 प्रतिशत से घटकर 2024 के अंत तक 34 प्रतिशत रह गई है. इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि पुरुष अपने परिवार की जरूरत को पूरा करने के लिए कमाने के अवसर तलाशने लगते हैं.
उच्च शिक्षा संस्थानों का दायरा भी बढ़ा है. प्रति लाख युवाओं पर कॉलेज की संख्या 2010 के 29 से बढ़कर 2021 में 45 हो गई, जिसमें निजी संस्थानों की बड़ी भूमिका रही है. इसके बावजूद क्षेत्रीय असमानताएं बनी हुई हैं और शिक्षकों की कमी एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आई है. निर्धारित मानकों के मुकाबले निजी और सरकारी कॉलेजों में शिक्षक-छात्र अनुपात काफी अधिक है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2010 के बाद औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) की संख्या में करीब 300 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, लेकिन इसके साथ खासकर निजी संस्थानों में गुणवत्ता को लेकर चिंताएं भी सामने आई हैं.
उच्च शिक्षा में गरीब परिवारों की भागीदारी बढ़ी है, जो 2007 के आठ प्रतिशत से बढ़कर 2017 में 15 प्रतिशत हो गई है लेकिन आर्थिक बाधाएं अब भी बनी हुई हैं. महंगे पेशेवर पाठ्यक्रमों.....मसलन इंजीनियरिंग व मेडिकल में अपेक्षाकृत संपन्न वर्ग के छात्र-छात्राओं की भागीदारी अधिक रहती है.
अधिक युवा शिक्षित और जागरूक हैं
अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की अध्यक्ष इंदु प्रसाद ने कहा, ‘‘आज पहले से अधिक युवा शिक्षित और जागरूक हैं और वे कुछ करने के इच्छुक हैं, जो एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है.'' देश में युवाओं (15-29 वर्ष) की उच्च शिक्षा तक पहुंच में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. हालांकि, रोजगार से जुड़ी चुनौतियां अब भी बरकरार हैं. 15-25 वर्ष के ग्रेजुएट्स में बेरोजगारी दर करीब 40 प्रतिशत और 25-29 वर्ष में करीब 20 प्रतिशत है.
रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रेजुएट होने के एक वर्ष के भीतर बहुत कम संख्या में ही युवाओं को स्थायी रोजगार मिल पाता है. हालांकि, ग्रेजुएट युवाओं को आय के मामले में लाभ मिलता है और उनकी शुरुआती कमाई गैर-ग्रेजुएट्स के मुकाबले लगभग दोगुनी होती है. इसके बावजूद 2011 के बाद युवा पुरुष ग्रेजुएट्स के वेतन में वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ी है. इसमें सामने आया कि युवा तेजी से कृषि क्षेत्र से हटकर विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं. सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी), मोटर वाहन और व्यावसायिक सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, जबकि पेशेवर क्षेत्र में जाति एवं स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव कम हुआ है.
रिपोर्ट की मुख्य लेखिका और विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर रोजा अब्राहम ने कहा कि यह अध्ययन पिछले 40 वर्ष के आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित है और शिक्षा से रोजगार तक युवाओं की यात्रा तथा उसमें आए बदलावों को दर्शाता है.
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