विज्ञापन

शरद पूर्णिमा में खीर क्यों रखी जाती है? जानिए क्या है धार्मिक मान्यता

हिंदू धर्म में पूर्णिमा का विशेष महत्व माना जाता है. शरद पूर्णिमा की रात को कुछ अन्य परंपराएं भी निभाई जाती हैं. जानिए शरद पूर्णिमा पर खीर को रात में खुले आसमान में क्यों रखा जाता है.

शरद पूर्णिमा में खीर क्यों रखी जाती है? जानिए क्या है धार्मिक मान्यता
शरद पूर्णिमा में खीर क्यों रखी जाती है?
file photo

हिंदू धर्म में पूर्णिमा का विशेष महत्व माना जाता है. आश्विन महीने की पूर्णिमा तिथि को हर वर्ष शरद पूर्णिमा मनाई जाती है. इसे कोजागरी पूर्णिमा, रास पूर्णिमा, कौमुदी व्रत या कुमार पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात को चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से युक्त होकर चमकता है. मान्यता है कि इस रात को चंद्रमा की किरणों से अमृत निकलता है. इस साल शरद पूर्णिमा 25 अक्टूबर की रात को मनाई जाएगी. आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को सुबह 11:55 बजे शुरू होगी और अगले दिन 26 अक्टूबर को सुबह 9:41 बजे समाप्त होगी. ऐसे में 25 अक्टूबर की रात को शरद पूर्णिमा है.

शरद पूर्णिमा का धार्मिक महत्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ महारास रचाया था, जिसे भक्ति और प्रेम का प्रतीक भी माना जाता है. इसके अलावा मान्यता यह भी है कि शरद पूर्णिमा की रात को माता लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं और देखती हैं कि कौन जाग रहा है, जो भी रात में जागते हैं और मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं, उन पर माता की विशेष कृपा बरसती है. रात को जागने की वजह से इसे कोजागरी व्रत भी कहते हैं.

शरद पूर्णिमा में खीर क्यों रखी जाती है?

शरद पूर्णिमा की रात को कुछ अन्य परंपराएं भी निभाई जाती हैं. मान्यता है कि शरद पूर्णिमा के अवसर पर गाय के दूध और चावल से बनी खीर को रात में खुले आसमान में रखा जाता है. ऐसा इसलिए किया जाता है, क्योंकि चंद्रमा की किरणें खीर पर पड़ सकें. अगले दिन सुबह इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है.

Latest and Breaking News on NDTV

शरद पूर्णिमा के अवसर पर माता लक्ष्मी की स्वर्णमयी मूर्ति की पूजा की जाती है. घी के दीपक जलाकर पूरी रात जागकर मंत्रों का जप किया जाता है. इस रात को भक्त माता लक्ष्मी और भगवान श्रीकृष्ण के मंत्रों का जाप करते हैं. इस अवसर पर सफेद वस्त्र, चावल, चीनी, चांदी के बर्तन और भोजन का दान करना शुभ माना जाता है.

चंद्रदेव को अर्घ्य देने का समय

पूर्णिमा पर शाम 4 बजकर 55 मिनट के बाद चंद्रदेव को अर्घ्य दिया जा सकता है. पूर्णिमा के दिन चंद्रोदय शाम 4 बजकर 46 मिनट पर होगा. हालांकि, अलग-अलग शहरों और स्थानों के अनुसार चंद्रमा दिखाई देने के समय में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चंद्रमा को अर्घ्य देने से मानसिक शांति और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है. इसे चंद्र दोष की शांति के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है.

यह भी पढ़ें:- तेजी से आगे बढ़ना है तो याद रखें चाणक्य नीति की ये 3 बातें

यह भी पढ़ें:- मंगल का सिंह राशि में गोचर, नवंबर में इन 3 राशियों की खुलेगी किस्मत, करियर में मिल सकती है बड़ी सफलता

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com