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Rama Ekadashi Vrat Katha: रमा एकादशी की कथा

मान्यता है कि एकादशी की पूजा तब तक पूर्ण नहीं होती है, जब तक इसकी व्रत कथा न सुनी या पढ़ी जाए. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की आराधना के साथ कथा श्रवण करने से ही व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त होता है. ऐसे में पूजा के बाद आप यहां से रमा एकादशी की व्रत कथा पढ़ सकते हैं.

Rama Ekadashi Vrat Katha: रमा एकादशी की कथा
रमा एकादशी पर पढ़ें राजा मुचुकुन्द और शोभन की संपूर्ण कथा
(Photo Credit: NDTV)

हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व माना जाता है. ये व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है. एक साल में कुल 24 एकादशी आती हैं. कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को रमा एकादशी कहा जाता है. इस दिन भगवान विष्णु के साथ मां लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है. रमा मां लक्ष्मी का ही एक दिव्य नाम है. धार्मिक मान्यता है कि रमा एकादशी के दिन सच्चे मन से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने से सभी पाप दूर हो जाते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है. हालांकि, मान्यता है कि एकादशी की पूजा तब तक पूर्ण नहीं होती है, जब तक इसकी व्रत कथा न सुनी या पढ़ी जाए. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की आराधना के साथ कथा श्रवण करने से ही व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त होता है. ऐसे में पूजा के बाद आप यहां से रमा एकादशी की व्रत कथा पढ़ सकते हैं.

रमा एकादशी की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से कार्तिक मास की एकादशी के बारे में पूछा. इसपर भगवान ने कथा सुनाते हुए कहा- एक समय में मुचुकुन्द नाम के एक राजा हुआ करते थे. वे भगवान विष्णु के बड़े भक्त थे और हमेशा सच का साथ देते थे. उनके राज्य में सभी लोग सुख और शांति से रहते थे. राजा के राज्य में एक खास नियम था, वहां हर कोई एकादशी का व्रत रखता था और इस दिन कोई भी व्यक्ति भोजन नहीं करता था.

राजा की एक बेटी थी, जिसका नाम चन्द्रभागा था. चन्द्रभागा का विवाह शोभन नाम के राजकुमार से हुआ था. एक बार शोभन अपनी पत्नी के साथ अपने ससुर राजा मुचुकुन्द के महल आए. उस दिन दशमी तिथि थी और अगले दिन एकादशी का व्रत रखा जाना था. पूरे राज्य में घोषणा कर दी गई कि एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं करेगा. हालांकि, यह बात सुनकर शोभन काफी परेशान हो गए. उनका शरीर कमजोर था और वे ज्यादा देर तक भूखे नहीं रह सकते थे. ऐसे में उन्होंने अपनी पत्नी चन्द्रभागा से पूछा कि इस स्थिति में वो क्या करें.

इस पर चन्द्रभागा ने बताया कि उनके पिता के राज्य में इंसानों के साथ पशु-पक्षी भी एकादशी के दिन अन्न और घास नहीं खाते हैं. ऐसे में उनके लिए भी व्रत रखना जरूरी है. पत्नी की बात सुनकर शोभन ने भी एकादशी का व्रत रखने का फैसला कर किया. लेकिन थोड़े ही समय में भूख के कारण उनकी हालत खराब होने लगी. उन्होंने किसी तरह पूरा दिन बिताया और रात में जागरण भी किया. लेकिन अगले दिन सूर्योदय होने से पहले ही उनके प्राण निकल गए, जिसके बाद राजा ने दुखी मन और पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार कराया.

रमा एकादशी के पुण्य से मिला सुंदर नगर

कहा जाता है कि रमा एकादशी का व्रत करने के पुण्य से शोभन को मृत्यु के बाद मंदराचल पर्वत पर एक बहुत सुंदर नगर मिला. वहां हर तरह की सुख-सुविधाएं थीं. शोभन उस नगर में राजा की तरह रहने लगे. लेकिन सब मिलने के बावजूद उनके मन में एक शंका रहती थी कि उनका व्रत पूरी श्रद्धा से नहीं हुआ था, इसलिए उनका यह नगर हमेशा नहीं रहेगा.

कुछ समय बाद राजा मुचुकुन्द के राज्य में रहने वाले सोमशर्मा नाम के एक ब्राह्मण तीर्थ यात्रा करते हुए उस पर्वत पर पहुंचे. वहां उन्होंने शोभन को देखा और पहचान लिया. शोभन ने उनसे अपनी पत्नी चन्द्रभागा और ससुर के बारे में पूछा. उन्होंने ब्राह्मण को बताया कि रमा एकादशी के व्रत के पुण्य से ही उन्हें यह सुंदर नगर मिला है.

सोमशर्मा ने वापस लौटकर चन्द्रभागा को पूरी बात बताई. पति के बारे में सुनकर वह बहुत खुश हुई और उनसे मिलने की इच्छा जताई. वह ब्राह्मण के साथ मंदराचल पर्वत के पास वामदेव ऋषि के आश्रम पहुंची. वहां ऋषि के आशीर्वाद और अपने एकादशी व्रत के पुण्य से चन्द्रभागा को दिव्य रूप मिला.

इसके बाद वह अपने पति शोभन के पास पहुंची. अपनी पत्नी को देखकर शोभन बहुत खुश हुए, उन्होंने चन्द्रभागा को अपने पास सिंहासन पर बैठाया. चन्द्रभागा ने बताया कि बचपन से लेकर अब तक उसने पूरी श्रद्धा से एकादशी के व्रत किए हैं. उन्हीं व्रतों के पुण्य से अब उनका नगर हमेशा के लिए स्थिर हो जाएगा.

मान्यता है कि जिस तरह शोभन और चन्द्रभागा को एकादशी का फल मिला, सच्चे मन से इस व्रत को करने, इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने और कथा सुनने से पापों से मुक्ति मिलती है, साथ ही जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है. 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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