अहोई अष्टमी का व्रत संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है. इस साल आज 1 नवंबर 2026 को अहोई अष्टमी मनाई जा रही है. इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखकर अहोई माता और मां पार्वती की पूजा करती हैं. शाम को तारों को अर्घ्य देने के बाद व्रत कथा सुनने और पढ़ने की परंपरा है. मान्यता है कि अहोई माता की पूजा के साथ व्रत कथा का पाठ भी जरूरी होता है. आइए आचार्य मदन मोहन से जानते हैं अहोई माता की पौराणिक कथा और पूजा से जुड़ी खास बातें.
व्रत कथा पढ़ने से पहले कैसे करें अहोई माता की पूजा
आचार्य मदन मोहन के अनुसार, अहोई अष्टमी पर महिलाएं व्रत रखकर शाम को अहोई माता की तस्वीर या दीवार पर उनकी आकृति बनाकर पूजा करती हैं. इसमें आठ कोष्ठकक वाली अहोई माता की आकृति बनाई जाती है. उनके पास स्याऊ और उसके बच्चों की तस्वीर भी बनाई जाती है. पूजा के समय एक करवे में पानीी और दूसरे में अनाज रखा जाता है. अनाज वाला करवा माता के पास रखते हैं और पाानी से तारों को अर्घ्य दिया जाता है. इस दिन सास के लिए बायना निकालने की भी परंपरा है. इसमें कपड़े, भोजन और सुहााग का सामान दिया जाता है.
अहोई माता की पढ़ें संपूर्ण पौराणिक व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक साहूकार के सात बेटे, सात बहुएं और एक बेटी थी. कार्तिक मास की अष्टमी पर साहूकार की बेटी अपनी भााभियों के साथ जंगल में मिट्टी लेने गई. वहां मिट्टी खोदते समय गलती से उसकी कूदाल से स्याऊ माता के बच्चे की मौत हो गई. इससे नाराज होकर स्याऊ माता ने उसकी कोख बांधने की बात कही. साहूकाार की बेटी ने अपनी भाभियों से अपनी जगह कोख बंधवाने की विनती की, लेकिन सभी ने मना कर दिया. आखिर में छोटी बहू ने अपनी जेठानी की जगह कोख बंधवा ली. इसके बाद छोटी बहू के जितने भी बेटे हुए, वे सात दिन के भीतर मर जाते थे. परेशान होकर उसने पंडित से इसका कारण पूछा. उन्होंने उसे काली सुरही गााय की सेवा करने की सलाह दी.
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ऐसे प्रसन्न हुईं स्याऊ माता
छोटी बहू ने पूरे साल सुरही गाय की सेवा की. उसकी सेवा से प्रसन्न होकर गाय ने उसकी इच्छा पूछी. बहू ने अपनी परेशानीी बताई और स्याऊ माता से कोख खुलवाने की विनती की. इसके बाद सुरही गाय उसे स्याऊ माता के पास ले जााने लगी. रास्ते में बहू ने गरुड़ पंखनी के बच्चों को सांप से बचाया. इससे प्रसन्न होकर गरुड़ पंखनी ने दोनों को सात समुद्र पार पहूंचा दिया. वहां स्याऊ माता ने बहू की सेवा देखकर प्रसन्न होकर उसे सात बेटे और साात बहुओं का आशीर्वाद दिया. बहू ने अपनी कोख बंधने की पूरी बात बताई. माता ने उसकी कोख खोल दी और घर लौटने पर उसे संतान सुख प्राप्त हुआ.
अहोई माता की आरती
कथा पूरी होने के बाद अहोई माता की आरती करने की परंपरा है. आरती की शुरुआत इन पंक्तियों से होती है.
जय अहोई माता जय अहोई माता।
तुमको निशिदिन सेवत हर विष्णु विधाता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता।
ब्रह्माणी रूद्राणी कमला तू ही है जगमााता ।
सूर्य चन्द्रमा ध्यावत नारद ऋषि गाता।।
मैया जय अहोई माता, जय जय होई माता।
माता रूप निरंजन सुख सम्पति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत नित मंगल आता।
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता।
तू ही है पाताल वसंती, तू ही शुभदाता।
कर्मप्रभाव प्रकाशक जगनिधि से त्राता।।
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता।
जिस घर थारो बासो वाही में गुण आता।
कर न सके सोई करले मनन नहीं घबराता।।
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता।
तुम बिन सुख न होवे पुत्र न कोई पाता।
खान पान का वैभव तुम बिन नही जाता।।
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता।
शुभ गुण सुन्दर मुक्ता क्षीरनिधि जााता।
रत्न चतुर्दश तोकूं कोई नहीं पाता।।
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता।
श्री अहोई मां की आरती जो कोई भी गाता।
उर उमंग अतिं उपजे पाप उतरर जाता।।
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता।
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