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33% नंबर मिलने पर ही क्यों होते हैं पास? जानें किसने बनाया था ये नियम और आज भी क्यों है लागू

Passing Criteria In India : भारत में 100 में सिर्फ 33 नंबर लाने वाला छात्र पास माने जाते हैं. यह नियम कई दशकों से चला आ रहा है. लेकिन इसके पीछे की वजह गणित नहीं, बल्कि अंग्रेजों के जमाने की शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी है.

33% नंबर मिलने पर ही क्यों होते हैं पास? जानें किसने बनाया था ये नियम और आज भी क्यों है लागू
पासिंग मार्क्स वाला फॉर्मूला कहां से आया?

Passing Criteria In India : 'पप्पू पास हो गया'... यह लाइन आपने फिल्मों, मीम्स या रिजल्ट के समय मजाक में कई बार सुनी होगी. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर 100 में सिर्फ 33 नंबर लाने वाला छात्र पास कैसे हो जाता है? पास होने की सीमा 33% ही क्यों तय की गई, 40% या 50% क्यों नहीं? दिलचस्प बात यह है कि इसके पीछे कोई गणित का फॉर्मूला नहीं, बल्कि अंग्रेजों के दौर से चली आ रही शिक्षा व्यवस्था की कहानी छिपी है. हैरानी की बात तो यह है कि जिस देश से यह व्यवस्था भारत आई, वहां भी अब कई परीक्षाओं में ऐसा नियम नहीं है. आइए जानते हैं कि 33% पासिंग मार्क्स का यह नियम कैसे शुरू हुआ और आज भी देश के कई बोर्ड और यूनिवर्सिटीज इसे क्यों मानते हैं. 

ऐसे हुई पासिंग मार्क्स की शुरुआत

भारत में 33% पासिंग मार्क्स की शुरुआत ब्रिटिश शासन के समय मानी जाती है. उस दौर में शिक्षा का मकसद बड़ी संख्या में ऐसे लोग तैयार करना था, जो सरकारी दफ्तरों में क्लर्क, ट्रांसलेटर और दूसरे प्रशासनिक काम संभाल सकें. इसलिए परीक्षा का सिस्टम भी ऐसा बनाया गया, जिसमें यह देखा जाए कि छात्र के पास काम चलाने लायक बेसिक जानकारी है या नहीं. माना जाता है कि समय के साथ यूनिवर्सिटीज और परीक्षा बोर्ड ने लगभग एक-तिहाई अंक को न्यूनतम योग्यता मानना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे यही व्यवस्था पूरे देश में आम हो गई.

1947 में आजादी मिलने के बाद देश की शिक्षा व्यवस्था में कई बदलाव हुए. नए सिलेबस आए, नए बोर्ड और यूनिवर्सिटीज बने, लेकिन 33% पासिंग मार्क्स का नियम कई जगह पहले की तरह बना रहा. आज भी देश के कई बोर्ड, यूनिवर्सिटीज और भर्ती परीक्षाओं में यही न्यूनतम पासिंग मार्क्स लागू हैं. हालांकि कुछ संस्थानों और प्रतियोगी परीक्षाओं में पासिंग मार्क्स इससे अलग भी हो सकते हैं.

क्या 33% सच में काफी हैं?

यहीं से बहस शुरू होती है. अगर कोई छात्र 100 में 33 नंबर लाता है, तो इसका मतलब है कि वह बड़ी संख्या में सवाल सही नहीं कर पाया. ऐसे में कई शिक्षा एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सिर्फ इतने अंक किसी विषय की अच्छी समझ का प्रमाण नहीं हो सकते. वहीं कुछ लोगों का कहना है कि पासिंग मार्क्स का मकसद छात्र की न्यूनतम योग्यता जांचना होता है, न कि उसकी पूरी क्षमता मापना.

ब्रिटेन में अब 33% जैसा कोई तय पासिंग मार्क्स नियम नहीं है, जबकि अमेरिका में भी पास होने के नियम हर स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय के हिसाब से अलग-अलग होते हैं. यानी हर देश की शिक्षा व्यवस्था का अपना तरीका है. भारत में भी समय-समय पर मूल्यांकन के तरीके में बदलाव की बात होती रही है, इसे लेकर चर्चा जरूर होती है, लेकिन अभी यह व्यवस्था पहले की तरह ही जारी है.

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