भारत में आज लड़कियां हर मामले में लड़कों के बराबर हैं और कुछ चीजों में तो उनसे आगे भी निकल रही हैं. तमाम बोर्ड रिजल्ट्स में इसकी झलक साफ दिखती है. महिलाओं के अधिकारों के लिए कई लोगों ने लंबी लड़ाई लड़ी और आज देश में उनके लिए अलग से गर्ल्स स्कूल से लेकर कॉलेज नजर आते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में लड़कियों के लिए पहला स्कूल किसने और कब खोला था? ये वो दौर था जब रूढ़िवादिता और सामाजिक बंधनों को तोड़कर महिलाओं के लिए शिक्षा की मजबूत नींव रखी गई थी.
लड़कियों के लिए किसने खोला पहला स्कूल?
भारत में लड़कियों के लिए पहला स्कूल सावित्रीबाई फुले और उनके पति महात्मा ज्योतिराव फुले ने खोला था. ये स्कूल 1 जनवरी 1848 को महाराष्ट्र के पुणे के भिड़े वाड़ा में शुरू किया गया था. सावित्रीबाई फुले को भारत की पहली महिला शिक्षिका भी माना जाता है. उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे काम किए, जिन्होंने भविष्य की नींव रखी और वो खुद स्कूलों में पढ़ाकर छात्रों को शिक्षित करने का काम करती थीं.
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समाज ने किया था विरोध
ये वो दौर था जब समाज में लड़कियों या महिलाओं को वो अधिकार नहीं थे, जो पुरुषों के पास थे. यही वजह है कि जब सावित्रीबाई फुले और ज्योतिराव फुले ने लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला, तो उन्हें समाज के विरोध का सामना करना पड़ा. लोग इस बात के खिलाफ थे कि लड़कियों को शिक्षा दी जाए, यही वजह थी कि सावित्रीबाई पर स्कूल जाते समय पत्थर, कीचड़ और गोबर से हमला किया जाता था. इस विरोध के बावजूद सावित्रीबाई ने हार नहीं मानी और लगातार प्रयास करती रहीं. कहा जाता है कि वो अपने साथ एक जोड़ी साड़ी एक्स्ट्रा लेकर चलती थीं, जिससे स्कूल पहुंचकर साफ कपड़ों में बच्चों को पढ़ा सकें.
फातिमा शेख ने भी दिया साथ
इस ऐतिहासिक काम के लिए सावित्रीबाई फुले को फातिमा शेख का भी पूरा साथ मिला. फातिमा शेख को भारत की पहली मुस्लिम महिला शिक्षिका माना जाता है. जब समाज के विरोध के कारण फुले को अपना घर छोड़ना पड़ा, तो फातिमा शेख और उनके भाई उस्मान शेख ने उन्हें अपने घर में शरण दी और स्कूल चलाने के लिए जगह भी दी. इसके बाद सावित्रीबाई और ज्योतिराव फुले ने मिलकर लड़कियों और गरीब वर्ग के बच्चों के लिए कुल 18 स्कूल खोले, जिसने महिलाओं के लिए शिक्षा और समानता के दरवाजे खोलने का काम किया.
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