Delhi Gymkhana Club: दिल्ली का पॉश और हाई-प्रोफाइल समझा जाने वाला जिमखाना क्लब इन दिनों काफी चर्चा में है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर यह क्लब बना कैसे था और दिल्ली के बीचोंबीच फैली इसकी 27 एकड़ से ज्यादा जमीन किसकी देन मानी जाती है? आज जिस क्लब की मेंबरशिप पाने के लिए लोग दशकों तक इंतजार करते हैं, उसकी शुरुआत ब्रिटिश दौर में एक बेहद खास सोच के साथ हुई थी. यह सिर्फ एक स्पोर्ट्स क्लब नहीं था, बल्कि सत्ता, रियासतों और अंग्रेज अफसरों के सोशल नेटवर्क का बड़ा केंद्र माना जाता था. दिलचस्प बात यह है कि इसकी नींव किसी एक राजा या सरकार ने नहीं, बल्कि कई रियासतों और ब्रिटिश अधिकारियों की साझेदारी से रखी गई थी.
किसने बनवाया था जिमखाना क्लब?
दिल्ली जिमखाना क्लब की स्थापना 2 जुलाई 1913 को “इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब” के नाम से हुई थी. उस दौर में ब्रिटिश सरकार ने भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्ली शिफ्ट करने का फैसला लिया था और नई राजधानी के साथ एक ऐसे सोशल क्लब की जरूरत महसूस की गई, जहां ब्रिटिश अधिकारी और भारतीय रियासतों के शासक मिल सकें. क्लब की स्थापना में सात बड़ी रियासतों के शासकों की अहम भूमिका मानी जाती है. इनमें ग्वालियर, जयपुर, जोधपुर, कश्मीर, उदयपुर, किशनगढ़ और भोपाल रियासत के शासक शामिल थे. इन सभी को क्लब का लाइफटाइम सदस्य बनाया गया था. क्लब के शुरुआती अध्यक्ष ब्रिटिश अधिकारी स्पेंसर हरकोर्ट बटलर बने थे.
कैसे मिली शहर के बीचों-बीच ये जमीन
दिल्ली के सफदरजंग रोड इलाके में फैली करीब 27.3 एकड़ जमीन ब्रिटिश सरकार ने साल 1918 में क्लब को लीज पर दी थी. यह जमीन खास शर्तों के साथ दी गई थी, जिसमें साफ कहा गया था कि यहां सिर्फ सोशल और स्पोर्ट्स गतिविधियों से जुड़ा क्लब ही चलाया जाएगा. दिलचस्प बात यह है कि इस जमीन का सालाना किराया उस समय सिर्फ 1000 रुपये तय किया गया था. हालांकि लीज में एक अहम क्लॉज भी जोड़ा गया था, जिसके मुताबिक सरकार जरूरत पड़ने पर कभी भी यह जमीन वापस ले सकती है. यही वजह है कि आज यह जमीन और क्लब फिर से चर्चा में हैं.
अभी क्यों हो रही है इसकी चर्चा
हाल के दिनों में दिल्ली जिमखाना क्लब फिर चर्चा में आ गया है, क्योंकि केंद्र सरकार ने क्लब को जमीन खाली करने का नोटिस दिया है. सरकार का तर्क है कि प्रधानमंत्री आवास के पास स्थित यह इलाका हाई-सिक्योरिटी जोन में आता है और भविष्य में इस जमीन की जरूरत सरकारी कामों के लिए पड़ सकती है. इसकी इमारत को ब्रिटिश आर्किटेक्ट रॉबर्ट टोर रसेल ने डिजाइन किया था. रसेल वही आर्किटेक्ट माने जाते हैं, जिन्होंने दिल्ली के कनॉट प्लेस और तीन मूर्ति भवन जैसी मशहूर इमारतों का डिजाइन भी तैयार किया था.
क्यों इतनी खास मानी जाती है इसकी मेंबरशिप?
दिल्ली जिमखाना क्लब की मेंबरशिप आज भी देश की सबसे मुश्किल सदस्यताओं में गिनी जाती है. यहां सदस्य बनने के लिए लोगों को कई-कई साल इंतजार करना पड़ता है. क्लब में लंबे समय तक नौकरशाह, सेना के अधिकारी, जज, मंत्री और बड़े कारोबारी शामिल होते रहे हैं. यही वजह है कि इस क्लब को सिर्फ स्पोर्ट्स या सोशल क्लब नहीं, बल्कि दिल्ली के पावर सर्कल का हिस्सा माना जाता है. करीब 113 साल पुराने इस क्लब की कहानी सिर्फ एक इमारत या जमीन की कहानी नहीं है, बल्कि यह ब्रिटिश दौर, भारतीय रियासतों और दिल्ली के बदलते पावर स्ट्रक्चर का भी अहम हिस्सा रही है.
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