सुप्रीम कोर्ट ने ज्यूडिशियल सर्विस में प्रवेश की शर्तों में बदलाव किया है. सुप्रीम कोर्ट ने ज्यूडिशियल सर्विस में प्रवेश से पहले कानूनी प्रैक्टिस अनिवार्य करने वाले अपने फैसले पर पुनर्विचार करने से इनकार कर दिया है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने तीन साल की अनिवार्य प्रैक्टिस की शर्त को घटा दिया है. तीन साल की अनिवार्य प्रैक्टिस को अब एक साल कर दिया है. संशोधित व्यवस्था के तहत न्यायिक सेवा में चयनित उम्मीदवारों को नियुक्ति के बाद ज्यूडिशियल अकादमी में प्रशिक्षण लेना होगा. इसके बाद उन्हें एक साल की क्लर्कशिप भी करनी होगी .सुप्रीम कोर्ट ने 2025 के अपने उस फैसले में संशोधन किया है, जिसमें एंट्री-लेवल न्यायिक सेवा में नियुक्ति के लिए तीन साल की वकालत का अनुभव अनिवार्य किया गया था.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
नए बदलाव के तहत 31 मार्च 2027 तक कानून स्नातक बिना अनिवार्य प्रैक्टिस अवधि पूरी किए न्यायिक सेवा के लिए आवेदन कर सकेंगे. इसके बाद एंट्री-लेवल न्यायिक सेवा में आवेदन करने के लिए कम से कम एक साल की सक्रिय वकालत अनिवार्य होगी. सुप्रीम कोर्ट के संशोधित ढांचे में चयन के बाद संरचित न्यायिक अकादमी प्रशिक्षण और क्लर्कशिप का प्रावधान भी रखा गया है.
जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने जताई असहमति
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज क्राइस्ट और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इसपर सुनवाई की. पीठ ने मई 2025 के फैसले के खिलाफ रिव्यू पिटीशन पर यह फैसला सुनाया. हालांकि CJI सूर्य कांत और जस्टिस एजी मसीह के बहुमत के फैसले से जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने असहमति जताई. उन्होंने पुर्नविचार याचिकाओं को खारिज करने के पक्ष में फैसला दिया. वहीं कोर्ट का ये फैसल उन छात्रों के लिए काफी पड़ा है जो कानून की पढ़ाई कर रहे हैं और आनेवाले समय में इस सर्विस में प्रवेश लेना चाहते हैं.
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