Ancient Indian Mathematicians and Discoveries: स्कूल के दिनों में हम सबने मैथ्स की क्लास में एक फॉर्मूला जरूर रटा था, 'पाइथागोरस थ्योरम' (Pythagoras Theorem). वही फॉर्मूला जो कहता है कि एक समकोण त्रिकोण (Right-Angled Triangle) में नीचे की लाइन (आधार) और सीधी लाइन (लंब) के स्क्वायर को जोड़ दें, तो तिरछी लाइन (कर्ण) का स्क्वायर मिल जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिसे आज पूरी दुनिया यूनान के वैज्ञानिक पाइथागोरस के नाम से जानती है, उसे एक भारतीय ऋषि ने पाइथागोरस के जन्म से भी 300 साल पहले ही लिख दिया था. उनका नाम ऋषि बौधायन था. आज दुनिया उनके इस अद्भुत दिमाग का लोहा मान रही है, लेकिन अफसोस कि हम भारतीयों ने ही अपनी इस महान विरासत को भुला दिया. आइए जानते हैं भारत के इस महान गणितज्ञ और उनके फॉर्मूले की पूरी कहानी.
जब दुनिया को गिनना नहीं आता था, तब भारत में चल रहा था 'शुल्व शास्त्र'
आज से करीब 2800 साल पहले (800 ईसा पूर्व), भारत में ऋषि बौधायन ने रेखागणित (Geometry) के कई बड़े नियमों की खोज की थी. उस जमाने में भारत में मैथ्स और ज्यामिति को 'शुल्व शास्त्र' कहा जाता था. 'शुल्व' का मतलब रस्सी या धागा होता है. प्राचीन काल में वैज्ञानिक रस्सी की मदद से ही बड़ी-बड़ी माप लिया करते थे.
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IIT बीएचयू प्रोफेसर का दावा
करीब 3 साल पहले 2023 में IIT बीएचयू के पूर्व डायरेक्ट प्रो. धनंजय पांडेय ने राष्ट्रीय संगोष्ठी 'वैदिक विज्ञान के विविध आयाम' में कहा कि 'वैदिक गणित और वैदिक विज्ञान बहुत समृद्ध हैं, लेकिन इन पर अभी और रिसर्च की जरूरत है. जिस सिद्धांत को आज पाइथागोरस थ्योरम कहा जाता है, उसे ऋषि बौधायन ने पहले ही कर दिया था, इसलिए कई लोग अब इसे बौधायन-पाइथागोरस सिद्धांत कहते हैं, जबकि इसे बौधायन सिद्धांत कहा जाना ज्यादा सही माना जाता है.'
आखिर इस फॉर्मूले की जरूरत क्यों पड़ी
प्राचीन भारत में जब बड़े-बड़े यज्ञ और अनुष्ठान होते थे, तो उनके लिए खास आकार की यज्ञवेदियां बनाई जाती थीं. इन वेदियों को बनाने के नियम इतने कड़े थे कि माप में जरा सी भी चूक होने पर पूजा अधूरी मान ली जाती थी. बिल्कुल सटीक चौकोर (Square), गोल (Circle) या त्रिकोण आकार की वेदी बनाने के लिए ऋषि बौधायन ने संस्कृत में एक श्लोक लिखा था.
ऋषि बौधायन का कौन सा श्लोक था
'दीर्घचतुरश्रस्य अक्ष्णया रज्जुः पार्श्वमानी तिर्यग्मानी च यत् पृथग्भूते कुरुतः तदुभयं करोति.'
इस श्लोक का मतलब क्या है
एक आयत (Rectangle) के तिरछे कोने को मिलाने वाली रस्सी (डायगोनल) से जो एरिया बनता है, वह उसकी खड़ी और आड़ी भुजाओं (Sides) से अलग-अलग बनने वाले एरिया के जोड़ के बराबर होता है. माना जाता है कि यही तो आगे चलकर पाइथागोरस थ्योरम बना.
सिर्फ त्रिकोण नहीं, 'पाई' और 'वर्गमूल' भी भारत की देन
कहा जाता है कि ऋषि बौधायन ने मैथ्स की दुनिया को और भी कई नायाब तोहफे दिए. उन्होंने उस दौर में बिना किसी कैलकुलेटर के 2 के स्क्वायर रूट का जो मान (Value) निकाला था, वह आज के आधुनिक कंप्यूटर से निकलने वाले मान के बिल्कुल करीब है. 'पाई' (Pi) भी उन्हीं की देन मानी जाती है. उन्होंने वृत्त (Circle) के क्षेत्रफल से जुड़े ऐसे कठिन सवालों को सुलझाया, जिसे देखकर आज के साइंटिस्ट भी हैरान रह जाते हैं.
अब सेलेबस में भी 'बौधायन-पाइथागोरस प्रमेय'
दुनियाभर के बड़े-बड़े गणितज्ञों और रिसर्चर्स ने अब यह मान लिया है कि यूनान के वैज्ञानिकों से बहुत पहले भारत के पास यह ज्ञान था. यही वजह है कि अब स्कूलों और किताबों जैसे NCERT में इसे सिर्फ पाइथागोरस थ्योरम न कहकर 'बौधायन-पाइथागोरस प्रमेय' पढ़ाया जाने लगा है, ताकि हमारे प्राचीन वैज्ञानिकों को उनका असली हक मिल सके.
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