हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर डॉक्टर बनने का सपना पूरा करना आसान नहीं था. लेकिन प्रियंका ने यह साबित कर दिया कि मजबूत इरादों के आगे परिस्थितियां छोटी पड़ जाती हैं. पिता को खो देने के बाद परिवार की जिम्मेदारियों और आर्थिक चुनौतियों के बीच पली-बढ़ी प्रियंका ने NEET-UG में 533 अंक हासिल कर ऑल इंडिया रैंक (AIR) 52,735 और कैटेगरी रैंक 1,608 हासिल की है. अब वो डॉक्टर बनने जा रही हैं, जो उनकी मां के लिए किसी सपने के सच होने से कम नहीं है.
पिता के निधन के बाद मां बनी सबसे बड़ी ताकत
NDTV से बातचीत में प्रियंका ने बताया कि उनके पिता का पांच साल पहले निधन हो गया था. इसके बाद उनकी मां ने परिवार की जिम्मेदारी संभाली. उनकी मां सरकारी स्कूल में मल्टी टास्क वर्कर (MTW) के रूप में काम करती हैं. परिवार में दो भाई भी हैं. प्रियंका कहती हैं कि कठिन समय में पूरे परिवार ने उनका साथ दिया, लेकिन उनकी मां और शिक्षकों का भरोसा उन्हें कभी टूटने नहीं दिया. वह कहती हैं, “मेरे परिवार, मेरे भाइयों और खासकर मेरे शिक्षकों ने हर कदम पर मेरा साथ दिया. आज मुझे खुशी है कि मैं उनकी उम्मीदों पर खरी उतर सकी.”
पहले आर्ट्स पढ़ना चाहती थी, शिक्षकों ने बदली सोच
प्रियंका की जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ 10वीं के बाद आया. वह आगे आर्ट्स लेने की सोच रही थी. इसी दौरान उनके दो शिक्षकों ने उनसे पूछा कि वह आगे कौन-सा विषय चुनना चाहती हैं. जब उन्होंने आर्ट्स लेने की बात कही तो शिक्षकों ने उन पर कोई दबाव नहीं बनाया, बल्कि विज्ञान विषय की संभावनाओं और उसके अवसरों के बारे में विस्तार से समझाया. यहीं से उनकी सोच बदलनी शुरू हुई. 11वीं और 12वीं की पढ़ाई के लिए जब उन्होंने गवर्नमेंट गर्ल्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल, ठियोग में एडमिशन लिया, तब पहली बार उन्हें NEET परीक्षा के बारे में जानकारी मिली.
शिक्षकों ने दिखाई मंजिल की राह
प्रियंका अपनी सफलता का श्रेय अपने शिक्षकों को देती हैं. वह बताती हैं कि उनके बायोलॉजी शिक्षक प्रकाश शर्मा ने विषय की मजबूत नींव तैयार की. वहीं, उनके पुराने स्कूल के पूर्व प्रधानाचार्य रमेश नेगी ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी. प्रियंका बताती हैं कि जब वह NEET की तैयारी को लेकर असमंजस में थी, तब रमेश नेगी ने खुद पहल की और उन्हें कोचिंग के बारे में बताया.
कई बार खुद पर भी नहीं रहा भरोसा
प्रियंका स्वीकार करती हैं कि तैयारी के दौरान कई ऐसे पल आए जब उन्हें खुद पर भी संदेह होने लगा. कई बार उन्हें लगता था कि क्या वह सच में सफल हो पाएंगी? लेकिन हर बार उनके शिक्षक और परिवार उनका हौसला बढ़ाते रहे. उनके अनुसार, “NEET में सफलता केवल अंकों का खेल नहीं है. यह अनुशासन, निरंतर मेहनत और बुरे दिनों में भी खुद पर विश्वास बनाए रखने की परीक्षा है.”
एक ही मंत्र- नियमित पढ़ाई
प्रियंका ने NEET में 533 अंक हासिल किए. उनकी पढ़ाई की रणनीति बेहद सरल थी. जिस दिन कक्षा में जो पढ़ाया जाता था, उसी दिन रिवीजन के लिए छोटे-छोटे नोट्स बनाती थी. वह बताती हैं कि यदि किसी दिन पढ़ाई छूट जाती थी तो उन्हें बुरा लगता था. इसी वजह से परीक्षा के समय उन्होंने दोस्तों के साथ समय बिताना, घूमना-फिरना और दूसरी गतिविधियां लगभग छोड़ दी थी. “मैंने खुद को पूरी तरह किताबों में समर्पित कर दिया था. आज लगता है कि उन सभी त्याग का परिणाम मिल गया.”
‘गांव या शहर नहीं, मेहनत तय करती है मंजिल'
प्रियंका का मानना है कि किसी की सफलता उसके गांव, शहर या पारिवारिक पृष्ठभूमि से तय नहीं होती. वह कहती हैं, “खुद को कभी कम मत समझिए. इससे फर्क नहीं पड़ता कि आप छोटे गांव से आते हैं या बड़े शहर से. आपकी पारिवारिक परिस्थितियां भी आपका भविष्य तय नहीं करतीं. सबसे ज्यादा मायने रखती है आपकी मेहनत, समर्पण और अपने सपनों के लिए भीतर की आग. अगर मैं कर सकती हूं तो देश के हजारों दूसरे बच्चे भी यह कर सकते हैं.”
छोटे से गांव से निकलकर डॉक्टर बनने की दिशा में बढ़ा प्रियंका का यह सफर बताता है कि सही मार्गदर्शन, परिवार का भरोसा और लगातार की गई मेहनत किसी भी मुश्किल को पार कर सकती है.
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