Skyroot Aerospace Suceess Story : जब देश गुरु पूर्णिमा पर अपने टीचर्स, मेंटर, गाइड और इंस्पिरेशन देने वाले लोगों को याद कर रहा है, तब स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) और मुकेश बंसल की कहानी इस बात का जीता-जागता उदाहरण बनकर सामने आती है कि सही समय पर मिला विश्वास किसी सपने को कितनी दूर तक पहुंचा सकता है.
कई बार इतिहास की सबसे बड़ी कहानियां किसी बड़े मंच, आलीशान बोर्डरूम या सरकारी घोषणा से नहीं, बल्कि एक सिंपल से मैसेज से भी शुरू हो सकती हैं. स्काईरूट एयरोस्पेस की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. तो चलिए जानते हैं एनडीटीवी की मुकेश बंसल और पवन चंदाना से हुई बातचीत से कैसे आज स्काईरूट एयरोस्पेस प्राइवेट स्पेस टेक कंपनी की नींव रखी गई, किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा और किसका साथ मिला.
शुरुआत एक अनजान मैसेज से
साल 2018 में तिरुवनंतपुरम स्थित ISRO के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर में काम करने वाले दो युवा इंजीनियरों ने उद्यमी और निवेशक मुकेश बंसल को लिंक्डइन (LinkedIn) पर एक मैसेज भेजा. हालांकि मैसेज बहुत छोटा सा था, लेकिन इसमें छिपा सपना बहुत बड़ा था. वे भारत में एक प्राइवेट रॉकेट कंपनी बनाना चाहते थे.
आज आपको सुनने में नॉर्मल बात लग रही होगी, लेकिन उस समय सिच्वेशन बिल्कुल अलग थी. भारत में प्राइवेट स्पेस फिल्ड की कोई मजबूत व्यवस्था नहीं थी. पाइवेट कंपनियों के लिए ऑर्बिटल रॉकेट बनाने और लॉन्च करने का कोई साफ रास्ता नहीं था. ऐसे माहौल में किसी प्राइवेट स्पेस स्टार्टअप पर दांव लगाना जोखिम भरा माना जाता था.

लेकिन मुकेश बंसल ने उस मैसेज में जोखिम नहीं, संभावना देखी. उन्होंने जवाब दिया और कुछ ही दिनों में दोनों से मुलाकात भी. उसी मुलाकात ने भारतीय स्पेस टेक्नोलॉजी के भविष्य की दिशा बदल दी.
पहली मुलाकात में 10 करोड़
एनडीटीवी (NDTV) से बातचीत में मुकेश बंसल ने बताया कि LinkedIn पर आए मैसेज ने उनका ध्यान तुरंत खींचने में सफल रहा.मैसेज में लिखा था कि दो ISRO इंजीनियर भारत में एक निजी रॉकेट कंपनी बनाना चाहते हैं. बंसल कहते हैं कि स्पेस सेक्टर में उनकी पहले से इंट्रस्ट था और वे स्पेस एक्स ( SpaceX) की प्रगति को भी करीब से देख रहे थे.
इसलिए मुकेश बंसल ने तुरंत मैसेज का रिप्लाई कर दिया और मुलाकात के लिए तैयार हो गए . पहली ही मुलाकात के बाद उन्होंने फाउंडर्स को मौखिक रूप से समर्थन दे दिया, हालांकि लास्ट डिसीजन लेने से पहले वे उनके विजन, योजना और प्रतिबद्धता को समझना चाहते थे.
उनके अनुसार सबसे बड़ी बात यह थी कि दोनों इंजीनियर अपने मिशन को लेकर पूरी तरह डेडिकेटेड दिखे. जब उन्हें यकीन हो गया कि वे अपनी पूरी जिंदगी इस मिशन को देने के लिए तैयार हैं, तब उन्होंने 10 करोड़ का इंवेस्टमेंट करने का फैसला किया.
पहले इंवेस्टर बन गए.
स्काईरूट (Skyroot) के सह-संस्थापक पवन चंदाना के लिए वह पहला इंवेस्टमेंट आज भी इमोशनली बहुत महत्व रखता है. उन्होंने बताया कि आठ साल पहले भेजे गए एक मैसेज का जवाब मिला, मुलाकात हुई और फिर मुकेश बंसल कंपनी के पहले इंवेस्टर बन गए.
चंदाना के अनुसार उस समय न कोई स्पेस पॉलिसी थी और न ही कोई एग्जांपल जो साबित कर सके कि कोई इंडियन प्राइवेट कंपनी ऑर्बिटल रॉकेट बना सकती है. ये सारी वजह इंवेस्टमेंट से दूर करने वाली थी, बावजूद इसके बंसल ने अनिश्चितता से आगे जाकर संभावनाओं को देखा.
कोविड में भी नहीं छोड़ा साथ
चंदाना बताते हैं कि Skyroot की जर्नी इतनी आसान नहीं थी. कोविड महामारी के दौरान कंपनी बड़ी फाइनेंशियल चैलेंजेज से जूझ रही थी. स्पेस सेक्टर को लेकर इंवेस्टर्स का इंट्रेस्ट बहुत लिमिटेड था. ऐसे में नए निवेश की संभावना भी कम थी.
ऐसे समय में मुकेश बंसल फिर से कंपनी के साथ खड़े हुए. उन्होंने 2 करोड़ का और निवेश किया. बंसल का मानना है कि यह निवेश शुरुआती निवेश जितना या उससे भी अधिक महत्वपूर्ण था, क्योंकि उसी ने कंपनी को कठिन दौर से बाहर निकलने में मदद की.
यहीं से कुल निवेश 12 करोड़ तक पहुंचा, जिसे Skyroot की उड़ान की वास्तविक ‘एस्केप वेलोसिटी' कहा जा सकता है.
जब सपना अंतरिक्ष तक पहुंचा
आठ साल की मेहनत, चुनौतियों और संघर्षों के बाद आखिर वह दिन आया जिसका इंतजार सभी को था. 18 जुलाई को Skyroot Aerospace का Vikram-1 रॉकेट श्रीहरिकोटा से अंतरिक्ष की ओर रवाना हुआ.
डॉ. विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया यह ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल भारत की निजी अंतरिक्ष यात्रा के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ. लॉन्च ने ग्लोबल लेवल पर सुर्खियां बटोरीं क्योंकि दुनिया में बहुत कम निजी कंपनियां ऑर्बिटल कैपिसीटी हासिल कर पाई हैं.
बंसल के मुताबिक, जैसे ही रॉकेट बादलों में ओझल हुआ, उन्हें महसूस हो गया कि मिशन सफल होगा.
सिर्फ निवेश नहीं, एक विश्वास
मुकेश बंसल कहते हैं कि Skyroot में उनका निवेश मुनाफे के लिए नहीं था. उन्होंने स्वीकार किया कि शुरुआत में उन्हें किसी रिटर्न की उम्मीद नहीं थी. उन्हें मिशन पर विश्वास था और वे देखना चाहते थे कि ये एंबीशियस यंगस्टर्स कितनी दूर तक जा सकते हैं.
हरिद्वार से आने वाले बंसल के लिए यह निवेश किसी ट्रेडिशनल एंजेल इंवेस्टमेंट से कहीं अधिक था. यह उस भरोसे का प्रतीक था जो किसी गुरु द्वारा अपने शिष्यों पर किया जाता है. यही वजह है कि Skyroot की कहानी को कई लोग डिजिटल युग की ‘दक्षिणा' भी कह रहे हैं.
मुझे Skyroot की अचीवमेंट पर गर्व है
सीरियल एंटरप्रेन्योर और इन्वेस्टर कहे जाने वाले मुकेश बंसल भारत के सबसे जाने-माने उद्यमियों में से एक हैं. IIT कानपुर से कंप्यूटर साइंस में ग्रेजुएट बंसल ने भारत के ई-कॉमर्स सेक्टर को बदलने में मदद की. इन्होंने मिंत्रा (Myntra) और बाद में क्योरफिट (Curefit) की स्थापना की. फिर भी, उनका कहना है कि Skyroot उनके करियर के सबसे फायदेमंद इंवेस्टमेंट में से एक है. वे कहते हैं कि खुद बनाए गए स्टार्टअप्स से कहीं ज्यादा, मुझे Skyroot की अचीवमेंट पर गर्व है.
इस देश के युवा कुछ भी कर सकते हैं
बंसल कहते हैं कि जब देश स्काईरूट की कामयाबी का जश्न मना रहा है, जो भारत और शायद दुनिया की पहली ऐसी कंपनी बन गई है. जिसने अपनी पहली ही कोशिश में ऑर्बिट तक सफल लॉन्च किया है, तो कई युवाओं को यह भरोसा हो रहा है कि वे भी ऐसा कर सकते हैं. वे आगे कहते हैं कि अगर हम रॉकेट बना सकते हैं, तो ऐसा कुछ भी नहीं है जो इस देश के युवा नहीं कर सकते. उनका यह संदेश भारत के भविष्य के लिए एक बड़े विजन को दिखाता है.
उनका मानना है कि स्काईरूट ने इनोवेटर्स की अगली पीढ़ी के लिए क्वांटम कंप्यूटिंग और एडवांस्ड चिप्स से लेकर फ्यूजन एनर्जी और ह्यूमनॉइड रोबोट्स जैसी नई टेक्नोलॉजी पर काम करने का रास्ता खोल दिया है.

पवन चंदाना को मिली सीख
चंदाना बताते हैं कि मुकेश बंसल की सबसे मूल्यवान सलाह पैसों से जुड़ी नहीं थी. बल्कि उन्होंने कहा था -“हमेशा सही काम करो. यह सफर तुम्हारी कल्पना से कहीं अधिक लंबा और कठिन होगा. प्रोडक्ट और ऑर्गनाइजेशन, दोनों को समान महत्व दो.”
आज भी Skyroot इसी सोच के साथ आगे बढ़ रही है.
कहानी सिर्फ रॉकेट की नहीं, भरोसे की है
आज, हजारों लोग स्काईरूट की कामयाबी से प्रेरणा लेते हैं. एक कंपनी जो IIT में ट्रेंड दो ISRO इंजीनियरों, एक सपने और एक LinkedIn मैसेज से शुरू हुई थी, वह भारत की सबसे बड़ी डीप टेक सक्सेस स्टोरीज में से एक बन गई है. शायद सही मायने में, यह कहानी सिर्फ एक रॉकेट के बारे में नहीं है. बल्कि भरोसे के बारे में है. एक गुरु जिन्होंने तब संभावना देखी जब दूसरे जोखिम देख रहे थे. एक दक्षिणा जिसकी मांग की गई और फिर LinkedIn के डिजिटल जमाने में उसे पूरा किया गया. और 12 करोड़ रुपये का भरोसे वाला कदम जिसने एक अरब डॉलर के सपने को ऑर्बिट तक पहुंचाने में मदद की. कुछ टेक्नी गुरु सच में बड़े सपने देखने वाले युवा भारतीयों को आगे बढ़ने की जबरदस्त रफ्तार दे सकते हैं.
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