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दुनिया कहती रही 'बेचारा', कैंसर से जूझ रहे 10वीं के छात्र ने 92% लाकर कर दी सबकी बोलती बंद

CBSE Board Result Success Story: सीबीएसई परीक्षा में 92 प्रतिशत अंक लाने वाले श्रीयांश कैंसर से जूझ रहे थे, इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और बोर्ड एग्जाम दिया. उनकी कहानी खासतौर पर उन लोगों के लिए प्रेरणा देने वाली है, जो छोटी सी परेशानी आने पर हार मान लेते हैं.

दुनिया कहती रही 'बेचारा', कैंसर से जूझ रहे 10वीं के छात्र ने 92% लाकर कर दी सबकी बोलती बंद
CBSE Board Result Success Story: कैंसर से जंग जीतकर बोर्ड परीक्षा में किया कमाल

CBSE Board Result Success Story: लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि अब पढ़ाई क्या कर पाएगा, एग्जाम देना तो दूर की बात है...क्योंकि वो तो खुद अपनी जिंदगी की जंग लड़ रहा है. रिश्तेदारों के साथ-साथ परिवार के लोगों ने भी उसे हारा हुआ मान लिया था, लेकिन उसने दुनिया के इन बेचारगी वाले तानों का जवाब दिया और साबित कर दिया कि हौसला हो तो कुछ भी मुमकिन हो सकता है.ये CBSE 10वीं बोर्ड परीक्षा में 92% अंक हासिल करने वाले कैंसर से जूझ रहे छात्र श्रीयांश वत्स की कहानी है, जब उसके साथ पढ़ने वाले छात्र क्लास ले रहे थे, तब उसकी रगों में दवाओं का जहर दौड़ रहा था. कैंसर जैसी बीमारी और समाज के तानों के बीच इस बच्चे ने तय किया कि उसकी पहचान बीमारी नहीं, बल्कि उसकी मेहनत से होगी. 

कैंसर जैसी बीमारी से जीती लड़ाई

एनडीटीवी ने चट्टान जैसे हौसले वाले इस छात्र और उसके पिता से बातचीत की, जिसने मौत को हराकर जिंदगी के इम्तिहान में टॉप किया. नोएडा के कैंब्रिज स्कूल में पढ़ने वाले छात्र श्रीयांश वत्स के पिता दिग्विजय सिंह ने बताया, "मेरा बेटे को 2023 में थर्ड स्टेज लिंफोमा हुआ था, जो एक कैंसर होता है. इसका ट्रीटमेंट चला और वो ठीक हो गया था, लेकिन 2025 मई में फिर से ये वापस लौट आया. ये ज्यादा एग्रेसिव होता है, इसीलिए इसका ट्रीटमेंट भी काफी एग्रेसिव होता है.  जुलाई 2025 में इसका बोन मैरो ट्रांसप्लांट हुआ, जिसमें बॉडी में रिसेट करके नया बोन मैरो डाला जाता है. इसमें करीब 6 महीने लगते हैं, बच्चे को नॉर्मल होने में... जुलाई से लेकर जनवरी तक ये प्रोसेस चला था. हालांकि मेरे बेटे को हॉस्पिटल में नहीं रहना था, इसीलिए उसने पहले ही स्कूल जाना शुरू कर दिया था."

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सभी ने छोड़ दी थी उम्मीद

श्रीयांश के पिता ने आगे बताया, "रिश्तेदारों ने, यहां तक कि मेरे अपने घर वालों ने मुझ पर प्रेशर बनाया कि बच्चे को स्कूल मत भेजो और बोर्ड एग्जाम मत दिलवाओ... सभी बोल रहे थे कि तुम बच्चे के साथ गलत कर रहे हो...फिर बेटे ने कहा कि नहीं पापा मैं एग्जाम दूंगा और अच्छे नंबर भी लाऊंगा. इसके बाद हमने उसका सपोर्ट किया और उसे ऑनलाइन कोचिंग भी करवाई. स्कूल का भी पूरा सपोर्ट था, जिसके बाद अब रिजल्ट सबके सामने है."

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हाफ ईयरली एग्जाम में हुआ था फेल

दिग्विजय सिंह ने बताया कि बेटे ने जनवरी से दिन रात एक करके रखा था. जब इसने स्कूल ज्वाइन किया तो वो हाफ ईयरली एग्जाम में फेल हो गया. क्योंकि उस वक्त वो तुरंत हॉस्पिटल से बाहर आया था. इसके बाद हमने टारगेट रखा कि हर एग्जाम में 10-10 नंबर ज्यादा लाएंगे, पिछले एग्जाम से... इसके बाद प्री-बोर्ड और दूसरे प्री-बोर्ड में नंबरों में सुधार हुआ. इस दौरान उसे स्कूल टीचर्स के अलावा ऑनलाइन टीचर्स से भी मदद मिली. 

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बेचारा समझने वालों को दिया जवाब 

श्रीवांश के पिता ने बताया कि बीमारी भी इसकी एक वजह है कि बच्चे ने इतना अच्छा प्रदर्शन किया है. उसे लोगों ने बेचारा समझ लिया था, इसीलिए उसके अंदर एक तरह की जिद भी आ गई थी कि जो आप लोग चाह रहे हैं वो मैं नहीं होने दूंगा. उन्होंने कहा कि हम तो इस बात से ही खुश थे कि बच्चा एग्जाम दे रहा है, अगर वो सिर्फ पास भी हो जाता तो हमारे लिए ये AIR-1 की तरह था. अगर बच्चा पास नहीं भी हो पाता तो हमारे लिए इतना काफी था कि हमारा बच्चा बच गया और उसने कोशिश की. 

जुलाई में एक टाइम ऐसा आया, जब इसके सारे ब्लड काउंट और प्लेटलेट्स लगभग जीरो हो गए थे. बोन मैरो ने नए ब्लड काउंट बनाना शुरू नहीं किया था. तीन दिन हमारे लिए काफी मुश्किल भरे थे. डॉक्टर्स ने भी कह दिया था कि अगले तीन से चार दिन तक हम कुछ नहीं बोल सकते हैं, जब बोन मैरो ने काम करना शुरू किया तो हमने राहत की सांस ली. 

श्रीयांश ने बताया कैसी रही जर्नी

सीबीएसई परीक्षा में 92 प्रतिशत अंक लाने वाले श्रीयांश ने बताया कि कैंसर के बाद उनके लिए कई चीजें काफी चुनौती भरी रहीं. टीचर्स और पापा के मोटिवेशन से हिम्मत मिली और खुद का भी था कि सबको गलत प्रूव करना है. रात के एक-दो बजे तक पढ़ना, सुबह उठना और फिर रूटीन में रहना... ये सब काफी चैलेंजिंग था. सब मानकर बैठे थे कि अब मैं बोर्ड एग्जाम ड्रॉप कर दूंगा, आधे से ज्यादा साल बीत चुका था, प्री-बोर्ड शुरू हो गए थे और दो महीने में बोर्ड परीक्षा थी. इसीलिए लोग कह रहे थे कि नहीं हो पाएगा, इतना प्रेशर लेने की जरूरत नहीं है. 

पेरेंट्स का रहा सबसे बड़ा रोल

श्रीयांश ने बताया कि, मेरी पूरी जर्नी में मेरे मम्मी-पापा का सबसे बड़ा रोल रहा है. अगर रात के 2 बजे तक मेरी क्लास चल रही है तो पूरा घर मेरे साथ जगा हुआ रहता था. उनके अलावा ऑनलाइन टीचर्स ने भी बहुत ज्यादा मदद की. उन्होंने बताया कि उनका टारगेट पूरे देशभर में पहला स्थान पाना था, लेकिन वो नहीं हो पाया. AIR-1 भले ही नहीं आ पाया, लेकिन अच्छे नंबर आए. मैंने ये सोचा था कि पेपर छोड़कर नहीं आना है. मैथ्स का एग्जाम मेरा बहुत अच्छा गया था. श्रीयांश ने बताया कि वो सीए बनना चाहते हैं, इसके लिए वो आगे ऐसे ही मेहनत करते रहेंगे. 

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