बिहार के कई स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था की हालत बेहद खराब है. अब मधेपुरा में सरकारी स्कूलों में बेहतर शिक्षा और आधुनिक सुविधाओं के दावों के बीच बेरवा का उत्क्रमित मध्य विद्यालय इन दावों की जमीनी हकीकत सामने रख रहा है. यहां कक्षा एक से आठ तक के 159 बच्चे महज दो कमरों और एक टीन के शेड के सहारे पढ़ने को मजबूर हैं. सवाल सिर्फ कमरों की कमी का नहीं, बल्कि उन बच्चों के भविष्य का है, जिनके लिए पढ़ाई का माहौल ही पर्याप्त नहीं है. हैरानी की बात ये है कि पहली से लेकर पांचवीं तक के बच्चे एक ही कमरे में पढ़ रहे हैं.
दो कमरों के भरोसे चल रहा स्कूल
स्कूल में नामांकित बच्चों में रोजाना करीब 90 से 110 छात्र-छात्राएं स्कूल पहुंचते हैं. लेकिन उनके लिए पर्याप्त कक्ष उपलब्ध नहीं हैं. हालात ऐसे हैं कि एक कमरे में कक्षा एक से पांच तक के बच्चों को एक साथ बैठाया जाता है, जबकि दूसरे कमरे में कक्षा छह से आठ तक के बच्चों की पढ़ाई होती है. यानी एक ही कमरे में अलग-अलग कक्षाओं के बच्चे, अलग-अलग विषय और अलग-अलग पाठ सब कुछ एक साथ चलता है.
गर्मियों में बच्चों को परेशानी
कहीं गणित के सवाल समझाए जा रहे हैं, तो कहीं भाषा का पाठ पढ़ाया जा रहा है. शिक्षक अपनी पूरी कोशिश करते हैं कि सभी बच्चों तक पढ़ाई पहुंचे, लेकिन सीमित जगह के कारण पढ़ाई का स्तर प्रभावित होना स्वाभाविक है. बच्चों को स्कूल तो मिल रहा है, लेकिन क्या उन्हें सीखने के लिए जरूरी वातावरण मिल पा रहा है यह सबसे बड़ा सवाल है. गर्मी के मौसम में परेशानी और बढ़ जाती है. टीन के शेड के नीचे बैठने वाले बच्चों के लिए तेज धूप और बढ़ता तापमान किसी चुनौती से कम नहीं है. सिर के ऊपर टीन की छत है, सामने किताबें हैं, लेकिन पढ़ने के लिए पर्याप्त और सुरक्षित जगह नहीं.
इस स्कूल के शिक्षक राधेश्याम राम ने बताया कि, बहुत कठिनाई से बच्चों को पढ़ाना पड़ता है. एक कमरे में कई कक्षाओं के बच्चों को बैठाना पड़ता है. इससे काफी समस्या होती है और बच्चों का सिलेबस भी पूरा नहीं हो पाता. मजबूरी में ऐसा पढ़ाते हैं कि सभी बच्चों को कुछ न कुछ समझ में आ जाए.
बजट मिलने के बाद भी नहीं हुआ काम
विद्यालय में प्रधानाध्यापक समेत कुल पांच शिक्षक हैं. शिक्षकों की कोशिश अपनी जगह है, लेकिन भवन और कमरों की कमी पूरी व्यवस्था पर भारी पड़ रही है. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि विद्यालय भवन के लिए राशि स्वीकृत होकर आई भी थी. लेकिन जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण निर्माण शुरू नहीं हो सका और राशि वापस लौट गई. अब सवाल यह है कि जब स्कूल में भवन की जरूरत पहले से साफ दिखाई दे रही थी, तो जमीन उपलब्ध कराने की ठोस पहल क्यों नहीं हुई?
ये सिर्फ एक स्कूल में कमरों की कमी की कहानी नहीं है. यह उस व्यवस्था पर सवाल है, जहां फाइलों में योजनाएं बनती हैं, राशि स्वीकृत होती है और समस्या ‘संज्ञान' में भी आती है लेकिन जमीन पर हालात जस के तस बने रहते हैं. सवाल है कि आखिर 159 बच्चों के लिए पर्याप्त भवन कब बनेगा? भवन निर्माण की राशि वापस क्यों जाने दी गई? विद्यालय के लिए जमीन उपलब्ध कराने की ठोस पहल कब होगी? और आखिर कब तक बच्चे टीन की तपती छत और दो कमरों की मजबूरी में पढ़ने को विवश रहेंगे?
बेरवा के इस सरकारी स्कूल की तस्वीर सिर्फ दो कमरों की कमी नहीं दिखाती, बल्कि योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी भी सामने लाती है. सवाल साफ है जब बच्चों का भविष्य दांव पर हो, तो व्यवस्था कब तक सिर्फ ‘संज्ञान में है' कहकर जिम्मेदारी पूरी करती रहेगी?
(रिपोर्ट - रमण कुमार)
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