नौकरी छूट जाने के खतरे से निपटने के लिए खरीद रहे हैं बीमा पॉलिसी...? ज़रा रुकिए, इसे ज़रूर पढ़ लें...

नौकरी से निकाल दिया जाना किसी भी कर्मचारी को मनोवैज्ञानिक तौर पर तोड़ डालता है. लगातार हर माह नियमित रूप से आ रही कमाई के बंद हो जाने से समस्याएं भी बढ़ जाती हैं, और ऐसा होना तब और भी ज़्यादा दिक्क्त देता है, जब आपके सिर पर किसी होम लोन या कार लोन या किसी भी अन्य लोन की किश्तें चुकाने की ज़िम्मेदारी हो.

नौकरी छूट जाने के खतरे से निपटने के लिए खरीद रहे हैं बीमा पॉलिसी...? ज़रा रुकिए, इसे ज़रूर पढ़ लें...

नौकरी से निकाले जाने को कवर करने के लिए बहुत-से लोग बीमा करवाने भागने लगते हैं...

नई दिल्ली:

आएदिन किसी न किसी कंपनी से छंटनी, यानी कर्मचारियों-अधिकारियों को नौकरी से निकाले जाने की ख़बरें काफी आम हो चली हैं. ट्विटर (Twitter Inc.) और मेटा (Meta) के बाद, ख़बरें मिल रही हैं कि अब अमेज़न भी 10,000 कर्मचारियों की छंटनी करने की योजना बना रहा है. इधर हिन्दुस्तान में भी स्टार्टअप, खासतौर से शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले स्टार्टअप, भी लगातार लोगों को नौकरियों से निकाल रहे हैं.

नौकरी से निकाल दिया जाना किसी भी कर्मचारी को मनोवैज्ञानिक तौर पर तोड़ डालता है. लगातार हर माह नियमित रूप से आ रही कमाई के बंद हो जाने से समस्याएं भी बढ़ जाती हैं, और ऐसा होना तब और भी ज़्यादा दिक्क्त देता है, जब आपके सिर पर किसी होम लोन या कार लोन या किसी भी अन्य लोन की किश्तें चुकाने की ज़िम्मेदारी हो.

आजकल जब नौकरियां जाने की ख़बरें लगातार सुर्खियां बन रही हैं, तब बहुत-से लोग नौकरी से निकाले जाने को कवर करने के लिए बीमा करवाने भागने लगते हैं, ताकि सचमुच नौकरी चले जाने की स्थिति में वित्तीय दिक्कतों में कुछ सहारा मिल सके. इस समय बाज़ार में कुछ ऐसी बीमा पॉलिसी मौजूद हैं, जो इस खतरे को कवर करने का वादा करती हैं, लेकिन यह बेहतरीन उपाय नहीं है.

इस मामले में हो सकता है, आपकी बीमा पॉलिसी आपके काम न आए, क्योंकि इस तरह की ज़्यादातर पॉलिसी उसी हालत में कवर देती हैं, जब नौकरी से खुद इस्तीफा न दिया गया हो, और कंपनी ने ही आपको निकाला हो. ध्यान रहे, किसी भी कर्मचारी के लिए यह साबित करना आसान नहीं होता कि उसने अपनी मर्ज़ी से इस्तीफा नहीं दिया है, क्योंकि कंपनियां आमतौर पर किसी भी कर्मचारी को निकालने के लिए उसी से इस्तीफा मांगा करती हैं.

लेकिन यह भी ध्यान रहे कि मौजूदा बीमा पॉलिसी को रीन्यू ज़रूर किया जाए, क्योंकि अगर बेरोज़गारी का वक्फा लम्बा हुआ, तो यही पॉलिसी काम आ सकती है. बिल्कुल वैसे ही, जैसे मेडिकल इंश्योरेन्स काम आता है.

वैसे, नौकरी से निकाले गए कर्मचारी को एक और झटका तब लगता है, जब आयकर अधिकारी, यानी इन्कम टैक्स अधिकारी उनके दरवाज़े पर दस्तक देते हैं. इन्कम टैक्स के शफसर कर्मचारी के पास इसलिए पहुंचते हैं, क्योंकि नौकरी से हटाए जाने पर मिलने वाला सेवरन्स पैकेज (Severance Package) करयोग्य, यानी टक्सेबल होता है. लेकिन किसी टैक्स सलाहकार से मशविरा करना कुछ फायदा दे सकता है, क्योंकि कुछ शर्तें पूरी होती हों, तो कुछ हिस्से पर टैक्स में छूट का दावा किया जा सकता है.

उदाहरण के लिए, सेवरेन्स पैकेज में हासिल हुए अवकाश यात्रा भत्ता, यानी लीव ट्रैवल अलाउंस (Leave Travel Allowance को टैक्सेबल इन्कम (करयोग्य आय) में से घटाया जाता है. जॉब इन्सिक्योरिटी के इस दौर में कामकाजी लोगों को पर्सनल फाइनेंस के लिहाज़ से ज़्यादा जागरूक रहना चाहिए, और पहले से प्लानिंग करके रखनी चाहिए.

नौकरी जाने की स्थिति में किसी भी तरह के लोन की किश्तें चुकाते रहना बेहद मुश्किल काम हो जाता है, सो, नौकरी पर रहते हुए ही पुनर्भुगतान योजना बना लेना समझदारी होता है. पर्सनल फाइनेंस के विशेषज्ञों का कहना है कि एक एमरजेंसी फंड बनाकर रखना चाहिए, जिसमें कम से कम तीन महीने की किश्त चुकाने लायक रकम रहनी चाहिए. यही फंड होगा, जो आड़े वक्त में आपके काम आएगा.

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