जब आधुनिक विज्ञान के तर्क और प्राचीन वास्तु शास्त्र की दिशाओं का आमना-सामना होता है, तो जीवन में किस तरह की उलझनें पैदा होती हैं, रविंद्र सिवाच के निर्देशन और संदीप कपूर के निर्माण में बनी फिल्म 'उत्तर दा पुत्तर' इसी ताने-बाने पर आधारित एक कहानी है जिसमें अन्नू कपूर ने मुख्य भूमिका निभाई है. फिल्म में कई जगह हंसी भी आती है.
क्या है कहानी
फिल्म की कहानी एक ऐसे फिजिक्स के प्रोफेसर (अन्नू कपूर) के इर्द-गिर्द घूमती है जो विज्ञान पढ़ाते हैं, लेकिन ज्योतिष और वास्तु शास्त्र में काफी विश्वास रखते हैं कि उनकी हर एक गतिविधि उसी के हिसाब से तय होती है. घर में टॉयलेट सीट की दिशा से लेकर हर छोटी चीज वास्तु के नियमों पर परखी जाती है. प्रोफेसर साहब को अपना नया घर बनाना है, लेकिन विज्ञान के शिक्षक का वास्तु और अंधविश्वास की सीमाओं के बीच उलझना और इस प्रक्रिया में कुछ अजीबोगरीब परिस्थितियों का सामने आना फिल्म का मुख्य विषय है.
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कमियां और खूबियां
‘उत्तर दा पुत्तर' फिल्म की निर्माण गुणवत्ता औसत है और इसके कुछ संवाद और भी ज्यादा बेहतर हो सकते थे. हालांकि, इन कमियों के बीच फिल्म में अन्नू कपूर का काम अच्छा है और बृजेंद्र काला तथा अन्नू की कॉमिक टाइमिंग अच्छी है. आज के हालात में जब बहुत से लोग वास्तु को लेकर भ्रम में रहते हैं, वैसी स्थिति में यह फिल्म ऐसे दर्शकों के लिए एक सामान्य विकल्प बन सकती है. इसके अलावा, रुखसार ने भी अपने हिस्से के काम को ठीक तरह से निभाया है.
निर्देशन और लेखन
संदीप कपूर और रविंद्र सिवाच की राइटिंग सामान्य स्तर की है. निर्देशक के तौर पर रविंद्र सिवाच ने एक सरल प्रयास किया है. फिल्म की अवधि लगभग 1 घंटे 43 मिनट की है, जो बहुत ज्यादा लंबी नहीं है. फिल्म की गति ठीक-ठाक है और यह अपनी कहानी के साथ आगे बढ़ती है.
निष्कर्ष और रेटिंग
कुल मिलाकर, यह एक ऐसी फिल्म है जो बहुत से लोगों को गुदगुदा सकती है क्यूँकि जैसा मैं कहता हूँ कॉमेडी बहुत सब्जेक्टिव चीज़ है जहाँ किसी को एक बात पर हँसी आ सकती है वहाँ हो सकता दूसरा उसपर बिल्कुल ना हँसे.
रेटिंग: 3 / 5 स्टार
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