मशहूर गायिका ऋचा शर्मा की आवाज में अलग ही ताकत और मिठास है. उन्होंने बॉलीवुड में रोमांटिक गाने गाए और सूफी संगीत में भी अपनी अलग पहचान बनाई. उन्होंने फिल्मों में अपनी आवाज का ऐसा जादू चलाया कि उनके कई गाने आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं. उनके सफर की शुरुआत बहुत छोटी उम्र में जगराते में भजन गाने से हुई थी और पहली कमाई के तौर पर उन्हें सिर्फ 11 रुपए मिले थे.
11 रुपयों को आज भी संभालकर रखा
ऋचा शर्मा का जन्म 29 अगस्त 1974 को फरीदाबाद में हुआ. उनके पिता दयाशंकर शर्मा खुद शास्त्रीय संगीत से जुड़े हुए थे और बेटी की आवाज को उन्होंने बचपन में ही पहचान लिया था. ऋचा को भी बचपन से ही गाने का शौक था. महज आठ साल की उम्र में उन्होंने जगराते में गाना शुरू कर दिया था. माता के भजन गाकर उन्हें पहली बार 11 रुपए मिले थे. ऋचा ने कई बार बताया कि वह अपनी पहली कमाई के उन 11 रुपयों को आज भी संभालकर रखती हैं. उनके लिए ये पैसे सिर्फ कमाई नहीं बल्कि उनके पूरे सफर की पहली याद हैं.
पढ़ाई से ज्यादा गायकी पर ध्यान
ऋचा ने अपने पिता से भजन गाना सीखा और आगे चलकर भारतीय शास्त्रीय संगीत की भी ट्रेनिंग ली. संगीत में उनका मन इतना लग गया था कि उन्होंने अपनी पढ़ाई से ज्यादा ध्यान गायकी पर देना शुरू कर दिया. इसके बाद उन्होंने जगरातों और दूसरे कार्यक्रमों में गाना जारी रखा. वह भजन के साथ-साथ अलग-अलग तरह का संगीत सीखती रहीं. बाद में उनकी गायकी में गजल, पंजाबी और राजस्थानी लोक संगीत का रंग भी देखने को मिला.
ऋचा की जिंदगी में बड़ा बदलाव तब आया जब वह मुंबई पहुंचीं. एक कार्यक्रम में उन्होंने माता के भजन गाए और उनकी आवाज ने लोगों का ध्यान खींचा. इसके बाद उन्हें फिल्म 'सलमा पे दिल आ गया' में गाने का मौका मिला. फिल्म 1996 में रिलीज हुई और यहीं से ऋचा का बॉलीवुड में प्लेबैक सिंगर के तौर पर सफर शुरू हुआ. उन्होंने धीरे-धीरे अपनी जगह बनानी शुरू की.
कई फिल्मों में अपनी आवाज दी
ऋचा ने एक के बाद एक कई फिल्मों में अपनी आवाज दी. फिल्म 'साथिया' के 'छलका-छलका रे' से लेकर 'कल हो ना हो', 'ओम शांति ओम' और 'माई नेम इज खान' तक उन्होंने कई यादगार गाने गाए. फिल्म 'जन्नत' का 'चार दिनों का प्यार ओ रब्बा' भी उनकी आवाज में खूब पसंद किया गया. वहीं 'ओमकारा' और बाद में 'गोल' से जुड़े 'बिल्लो रानी' ने उन्हें अलग तरह की लोकप्रियता दी.
ऋचा ने भजन और सूफी संगीत से अपना रिश्ता कभी नहीं छोड़ा. बॉलीवुड में पहचान मिलने के बाद भी वह धार्मिक कार्यक्रमों और सूफी संगीत से जुड़ी रहीं. साल 2006 में फिल्म 'बाबुल' के लिए उन्होंने एक लंबा विदाई गीत भी गाया था, जिसे बॉलीवुड के लंबे गानों में गिना जाता है. उन्होंने कई अवॉर्ड्स भी अपने नाम किए. साल 2003 में उन्हें 'कांटे' के गाने 'माही वे' के लिए सर्वश्रेष्ठ महिला प्लेबैक सिंगर का बॉलीवुड मूवी अवॉर्ड मिला. बाद में 'सजदा' के लिए उन्हें 2011 में जी सिने अवॉर्ड भी मिला.
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