रामायण एक विशाल कहानी है, अवधि के लिहाज से भी और अपनी अहमियत के लिहाज से भी. इसे दो भागों में खत्म करने का मतलब है फिल्मकार को एक समय सीमा में बांध देना. वह भी तब, जब घर-घर में बच्चे इस कहानी के साथ बड़े हुए हैं. दशहरे से पहले रामलीला भी कई दिनों तक चलती है. ऐसे में रामायण जैसी विशाल गाथा को करीब छह घंटे में समेट पाना अपने आप में एक असंभव-सा काम है. वह भी सही भावनाओं, प्रभावशाली दृश्यों और जटिल तकनीक के साथ.
ऐसे में जो भी इस कहानी को पर्दे पर उठाने का साहस करता है, उसकी तारीफ बनती है, बशर्ते वह तथ्यों के साथ छेड़छाड़ न करे और कहानी की सच्चाई तथा उसके मूल भाव के प्रति निष्ठावान रहे. आखिरकार, इसके साथ करोड़ों लोगों की भावनाएं और आस्था जुड़ी हैं. इसके लिए निर्माता नमित मल्होत्रा और निर्देशक नितेश तिवारी की तारीफ बनती है कि उन्होंने 'आदिपुरुष' जैसा प्रयोग नहीं किया. उन्होंने बरसों से रामायण पढ़ने और सुनने वाले लोगों की कल्पना के साथ बहुत ज्यादा छेड़छाड़ नहीं की. यही उनकी सबसे बड़ी जीत है.
फिल्म की कमजोरियां
1. रणबीर कपूर को राम के रूप में स्वीकारने में लगता है वक्त
शुरुआत में रणबीर पर प्रभु श्रीराम का किरदार निभाने का भार कुछ ज्यादा ही नजर आता है. वह श्रीराम की दिव्य आभा को भगवान के रूप में निभाएं या एक पुरुष के रूप में, इस दुविधा में दिखाई देते हैं. हालांकि, फिल्म आगे बढ़ने के साथ वह अपने किरदार में सहज होते जाते हैं. एक कलाकार के तौर पर रणबीर ने अब तक कई ऐसे किरदार निभाए हैं, जिनकी छवि दर्शकों के जेहन में बेहद मजबूत है. शायद यही वजह है कि शुरुआत में उन्हें श्रीराम के रूप में स्वीकार करना थोड़ा मुश्किल लगता है.
2. रणबीर की ऑफस्क्रीन छवि भी एक वजह
दर्शक रणबीर कपूर के बारे में बहुत कुछ जानते हैं. वह कौन हैं, कहां से आए हैं, उनका स्वभाव कैसा है, उनकी निजी जिंदगी कैसी है. इसके उलट, पहले राम का किरदार निभाने वाले कलाकारों की कोई बहुत चर्चित ऑफस्क्रीन छवि नहीं थी. इसलिए दर्शकों के लिए उन्हें श्रीराम के रूप में स्वीकार करना आसान था. ठीक वैसे ही जैसे गांवों में रामलीला में राम और सीता का किरदार निभाने वाले कलाकारों को लोग सिर आंखों पर बैठाते हैं. दर्शक उनके निजी जीवन के बारे में नहीं जानते और मंच पर उन्हें राम और सीता के रूप में ही देखते हैं.
3. पहले हिस्से में इमोशन की कमी
रामायण का यह हिस्सा कई ऐसे भावुक प्रसंगों से भरा है, जिन्हें देखकर दर्शकों की आंखें नम होनी चाहिए थीं, लेकिन निर्देशक कई मौकों पर भावनाएं जगाने में चूक गए. भरत मिलाप और राम का अयोध्या छोड़ना ऐसे ही प्रसंग हैं, जहां और बेहतर तरीके से भावनात्मक प्रभाव पैदा किया जा सकता था.
4. स्क्रीनप्ले में कमी
रामायण को दो भागों में समेटना मुश्किल काम है. शायद इसी दबाव में निर्देशक कई महत्वपूर्ण दृश्यों को सिर्फ दिखाकर आगे बढ़ गए. जहां कहानी और किरदारों के भावनात्मक पक्ष को विस्तार देने का मौका था, वहां पर्याप्त समय नहीं दिया गया.
5. बैकग्राउंड स्कोर बहुत लाउड
फिल्म के पहले हिस्से में बैकग्राउंड स्कोर काफी तेज है. कई जगह इसकी वजह से राम और रावण की आवाज दब जाती है. जबकि इन दोनों किरदारों के संवाद और उनकी आवाज में ऐसा प्रभाव होना चाहिए, जो दर्शकों के भीतर एक अलग अनुभूति पैदा करे.
6. स्पेशल इफेक्ट्स में कमी
फिल्म के कुछ स्पेशल इफेक्ट्स कमजोर लगते हैं. एआई के इस्तेमाल से मुझे कोई समस्या नहीं है, क्योंकि बदलती तकनीक फिल्मकारों की मदद के लिए है, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण किरदारों को एआई के जरिए तैयार करने के बजाय कलाकारों के साथ फिल्माना बेहतर होता.
7. एक्शन दृश्यों में और बेहतर हो सकती थी प्रस्तुति
फिल्म के कई एक्शन सीक्वेंस में बड़े और यादगार दृश्य रचने की संभावना थी, लेकिन निर्देशक वहां पूरा फायदा नहीं उठा पाए.
8. संवादों पर और मेहनत की जरूरत
रामायण जैसे महाकाव्य में संवादों का अपना अलग महत्व है. फिल्म के कुछ संवादों को और बेहतर लिखा जा सकता था.
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फिल्म की खूबियां
1. यश रावण के रूप में छाए
फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यश हैं. रावण के किरदार में उनका व्यक्तित्व, स्क्रीन प्रेजेंस और अभिनय प्रभावशाली है. वह पर्दे पर आते हैं तो छा जाते हैं.
2. रवि दुबे का स्वाभाविक अभिनय
रवि दुबे ने बेहद सहज और स्वाभाविक अभिनय किया है. उनका काम बेहतरीन है और वह अपने किरदार में कहीं भी बनावटी नहीं लगते.
3. साई पल्लवी का ठीक काम और सीता का अनदेखा रूप
साई पल्लवी को सीता के रूप में आप पसंद करें या न करें, लेकिन अभिनय के स्तर पर उनका काम ठीक है. हालांकि, सीता के किरदार से जुड़ी एक दिलचस्प बात फिल्म में देखने को मिलती है. बहुत कम लोग जानते हैं कि सीता एक कुशल योद्धा भी थीं. 'रामायण' में उनका यह रूप भी दिखाया गया है, जो दर्शकों के लिए एक अच्छा सरप्राइज है.
4. रकुल प्रीत सिंह प्रभावशाली
रकुल प्रीत सिंह अपने किरदार के साथ पूरा न्याय करती हैं और प्रभावशाली नजर आती हैं.
5. शूर्पणखा की अनसुनी कहानी
फिल्म में शूर्पणखा की बैकस्टोरी दिखाई गई है, जिसके बारे में शायद रामायण के बहुत से दर्शकों को विस्तार से जानकारी नहीं होगी. इस कहानी के जरिए आपको एक अहम वजह समझने का मौका मिलता है कि रावण ने सीता का अपहरण क्यों किया.
6. रामायण के कम प्रचलित प्रसंग
फिल्म में रामायण के कुछ ऐसे प्रसंगों पर भी रोशनी डाली गई है, जो आमतौर पर बहुत ज्यादा प्रचलित नहीं हैं. ये हिस्से दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखते हैं और कहानी को एक नया नजरिया देते हैं.
7. रावण का शिव तांडव प्रभावशाली
रावण का शिव तांडव फिल्म के सबसे प्रभावशाली दृश्यों में से एक है. श्यामक डावर की कोरियोग्राफी इस दृश्य को और दमदार बनाती है.
8. कुमार विश्वास के गीत के बोल
कुमार विश्वास के लिखे बोल भी असर छोड़ते हैं. 'जय जय राम' ऐसा गीत है, जो एक बार सुनने के बाद दिमाग में घर कर जाता है और लंबे समय तक लूप पर बजता रहता है.
9. कुछ एक्शन सीक्वेंस तालियां बटोरने वाले
फिल्म के कई एक्शन दृश्यों में निर्देशक कुछ ऐसा रचने में कामयाब रहे हैं, जो दर्शकों को तालियां बजाने पर मजबूर कर देगा. खर-दूषण के साथ युद्ध, जटायु के साथ युद्ध और रावण को मारने की राम की प्रतिज्ञा जैसे दृश्य बेहद प्रभावशाली हैं. हालांकि, कुछ दूसरे एक्शन सीक्वेंस में भी इससे कहीं ज्यादा बेहतर और यादगार दृश्य रचने की गुंजाइश थी.
10. 'आदिपुरुष' वाली गलती नहीं दोहराई
सबसे अहम बात यह है कि फिल्मकारों ने 'आदिपुरुष' वाली गलती नहीं दोहराई है. रामायण जैसे विषय को पर्दे पर उतारते समय उसकी गरिमा और प्रस्तुति का ध्यान रखना जरूरी है और इस मामले में फिल्मकारों ने काफी हद तक सावधानी बरती है.
कुल मिलाकर: 'रामायण' में भव्यता, प्रभावशाली कलाकार और कुछ यादगार दृश्य हैं. यश का रावण के रूप में छा जाना, रवि दुबे का स्वाभाविक अभिनय और कुछ अनसुने प्रसंग इसकी खूबियां हैं. हालांकि, फ़िल्म के पहले हिस्से में कमजोर स्क्रीनप्ले और डायलॉग्स, कई दृश्यों में भावनाओं की कमी, लाउड बैकग्राउंड स्कोर और कुछ कमजोर स्पेशल इफेक्ट्स इसकी चमक को थोड़ा फीका करते हैं. रामायण जैसे महाकाव्य को पर्दे पर उतारने के लिए सिर्फ भव्यता काफी नहीं होती, उसके भावनात्मक पक्ष को भी उतनी ही गहराई से दिखाना जरूरी है. यही वह जगह है, जहां फिल्म कुछ और बेहतर हो सकती थी.
कलाकार: रणबीर कपूर, यश, साई पल्लवी, रवि दुबे, अरुण गोविल, रकुल प्रीत सिंह, लारा दत्ता, इंदिरा कृष्णन, काजल अग्रवाल, शिबा चड्ढा, विवेक ओबेरॉय और अन्य.
निर्देशक: नितेश तिवारी
निर्माता: नमित मल्होत्रा
पटकथा: श्रीधर राघवन और नितेश तिवारी
संवाद: नितेश तिवारी और श्रेयस जैन
संगीत: ए. आर. रहमान और हैंस जिमर
गीत: कुमार विश्वास
छायांकन: पंकज कुमार और महेश लिमये
संपादन: हुजेफा लोकखंडवाला
कोरियोग्राफी: श्यामक डावर
Stars- 3.5
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