फिल्मों के कई गाने आते हैं, हिट होते हैं और फिर वक्त के साथ भुला दिए जाते हैं. लेकिन कुछ गाने ऐसे भी होते हैं. जो सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रहते बल्कि लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन जाते हैं. दिलीप कुमार की फिल्म 'नया दौर' का गाना साथी हाथ बढ़ाना... भी ऐसा ही एक गीत है. करीब 69 साल पहले रिलीज हुआ ये गाना आज भी किसी आंदोलन, प्रोटेस्ट या जन अभियान में लोगों का हौसला बढ़ाता नजर आता है. इसकी सबसे बड़ी ताकत है इसका संदेश जो कहता है कि मिलकर चलो, साथ लड़ो और हार मत मानो.
जब-जब लोग हुए एकजुट, तब-तब गूंजा गाना
साल 1957 में रिलीज हुई 'नया दौर' में ये गाना उस वक्त आता है. जब गांव के लोग अपने हक और अपने भविष्य के लिए एकजुट होकर मेहनत करते हैं. फिल्म में इस गाने का रिफ्रेंस सड़क बनाने से जुड़ा है. लेकिन इसके बोल सिर्फ उस कहानी तक सीमित नहीं हैं. यही वजह है कि सालों बाद भी ये गीत हर उस मौके पर फिट बैठता है. जहां लोग किसी मकसद के लिए एक साथ खड़े होते हैं. छात्र आंदोलन हो, मजदूरों का प्रदर्शन हो या कोई सोशल मूवमेंट, साथी हाथ बढ़ाना... अक्सर वहां सुनाई देता है. इस गाने की सबसे बड़ी खूबी यही है कि ये किसी एक दौर का नहीं, बल्कि हर दौर का गीत लगता है.
रफी की आवाज, साहिर के बोल
इस यादगार गीत को मोहम्मद रफी और आशा भोंसले ने अपनी आवाज दी थी. इसके बोल मशहूर गीतकार साहिर लुधियानवी ने लिखे. जबकि शानदार संगीत ओ.पी. नैय्यर ने तैयार किया था. इन चार दिग्गजों की मेहनत ने इस गाने को हमेशा के लिए यादगार बना दिया. फिल्म में दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला की शानदार केमिस्ट्री भी देखने को मिली थी, लेकिन वक्त के साथ साथी हाथ बढ़ाना... फिल्म से निकलकर लोगों की आवाज बन गया.
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