धुरंधर फिल्म का 'दिल पे जख्म खाते हैं' सॉन्ग तो आपके जहन में अब भी ताजा ही होगा. आप जानते हैं ये गाना 49 साल पुरानी कव्वाली का रीक्रिएट वर्जन था. बेशक सुनकर हैरत हो सकती है. लेकिन ये सच है. ओरिजिनल क्लासिक कव्वाली 'दिल पे जख्म काते हैं' को 49 साल पहले गाया गया था. इसे गाने वाले कोई और नहीं बल्कि उस्ताद नुसरत फतेह अली खान थे. साल था 1977. इस कव्वाली को इकबाल सैफीपुरी ने लिखा था. लेकिन जब धुरंधर में इस नए अवतार में पेश किया गया तो एक बार फिर से लोगों की यादें ताजा हो गईं और ये हिट हो गई. इसे गाने वाले नुसरत फतेह अली खान को लोगों का इतना प्यार मिलता था कि इन्हें जापान में 'सिंगिंग बुद्ध' की उपाधि से नवाजा गया था. ऊपर नजर आ रही फोटो दाएं तरफ खड़ा ये लड़का कोई और नहीं दिवंगत उस्ताद नुसरत फतेह अली खान ही हैं.
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सूफी गायिकी के उस्ताद
नुसरत फतेह अली खान की गायकी सिर्फ संगीत नहीं थी, बल्कि एक ऐसा एहसास थी जो सीधे लोगों के दिल और रूह तक उतर जाता था. आज भी ‘अफरीन अफरीन', ‘ये जो हल्का हल्का सुरूर है' और ‘तुम्हें दिल्लगी भूल जानी पड़ेगी' जैसे गीत सुनते ही लोग पुराने दौर में खो जाते हैं. इंटरनेट पर नुसरत फतेह अली खान की एक बचपन की तस्वीर लोगों का ध्यान खींच रही है. ब्लैक एंड व्हाइट फोटो में नुसरत अपने भाई फारुख फतेह अली खान के साथ नजर आ रहे हैं. दोनों साधारण कुर्ता-पाजामा पहने कैमरे की तरफ देख रहे हैं.
वहीं, इस तस्वीर को लेकर सोशल मीडिया पर एक अलग बहस भी छिड़ गई है. कुछ यूजर्स का कहना है कि फोटो में दोनों भाइयों के हाथ और उंगलियां जिस तरह आपस में जुड़ी दिखाई दे रही हैं, वह थोड़ा असामान्य लग रहा है. इसी वजह से कुछ लोग इसे AI जनरेटेड तस्वीर होने की संभावना भी जता रहे हैं.
पारंपरिक कव्वाली का मॉडर्न अंदाज
13 अक्टूबर 1948 को पाकिस्तान के फैसलाबाद में जन्मे नुसरत फतेह अली खान ऐसे परिवार से आते थे, जहां करीब 600 सालों से सूफी संगीत और कव्वाली की परंपरा चली आ रही थी. लेकिन उनके पिता चाहते थे कि वे डॉक्टर बने क्योंकि संगीत में सिक्योर करियर नहीं था. लेकिन उन्हें तो गायकी दुनिया में ही आना था. यही नहीं, उनका असली नाम परवेज था. लेकिन उनके पिता ने जब उनकी गायिकी का शौक देखा तो उन्हें नुसरत नाम दिया. संगीत उनके लिए सिर्फ कला नहीं, बल्कि विरासत था. लेकिन जिस तरह नुसरत साहब ने कव्वाली को इंटरनेशनल पहचान दिलाई, उसने उन्हें इतिहास में हमेशा के लिए अमर कर दिया.
नुसरत फतेह अली खान ने पारंपरिक कव्वाली को मॉडर्न अंदाज में दुनिया के सामने पेश किया. उन्होंने अमीर खुसरो के कलाम से लेकर सूफियाना इश्क तक को अपनी आवाज में ऐसा रंग दिया कि लोग मंत्रमुग्ध हो गए. ‘सांसों की माला पे सिमरूं मैं पी का नाम', ‘आंख उठी मोहब्बत ने', ‘अल्लाह हू' और ‘सोचता हूं कि वो कितने मासूम थे' जैसे गीत आज भी नई पीढ़ी के बीच उतने ही लोकप्रिय हैं.
यूरोप और अमेरिका में भी गूंजी उनकी आवाज
उनकी कव्वाली सिर्फ भारत और पाकिस्तान तक सीमित नहीं रही. उन्होंने पीटर गैब्रियल और माइकल ब्रुक जैसे इंटरनेशनल कलाकारों के साथ भी काम किया. यही वजह रही कि उनकी आवाज यूरोप और अमेरिका तक गूंजने लगी. उन्हें शहंशाह-ए-कव्वाली भी कहा जाता था.
16 अगस्त 1997 को नुसरत फतेह अली खान इस दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन उनकी आवाज आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में जिंदा है. शायद यही वजह है कि उनकी जिंदगी से जुड़ी हर पुरानी तस्वीर, हर पुराना किस्सा और हर पुराना सुर आज भी लोगों को उतना ही भावुक कर देता है.
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