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जब अपनों से बिछड़ने का दर्द बन गया गीत, जगजीत सिंह की आवाज में सजा ये नगमा, 28 साल बाद भी दिल को करता है बेचैन

एक ऐसा गीत, जिसे सुनते ही न जाने कितनी पुरानी यादें आंखों के सामने तैरने लगती हैं. 28 साल बाद भी इसके बोल और जगजीत सिंह की आवाज दिल में वही टीस छोड़ जाते हैं. इस गाने को उन यकीनन आप भी रोए होंगे.

जब अपनों से बिछड़ने का दर्द बन गया गीत, जगजीत सिंह की आवाज में सजा ये नगमा, 28 साल बाद भी दिल को करता है बेचैन
रोने को मजबूर कर देता है जगजीत सिंह का ये गाना

बॉलीवुड में कई ऐसे गाने बने हैं जो सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि जज्बात बनकर लोगों के दिलों में बस गए. साल 1998 में रिलीज हुई फिल्म ‘दुश्मन' का गीत ‘चिट्ठी ना कोई संदेश, जाने वो कौन सा देश…' उन्हीं अमर नग्मों में शामिल है. जगजीत सिंह की दर्दभरी आवाज और गीत के मार्मिक बोल आज भी सुनने वालों की आंखें नम कर देते हैं. बिछड़ने का दर्द, अपनों की कमी और कभी न लौटने वाले इंसान की याद को इस गीत ने जिस संवेदनशीलता से पिरोया, वह इसे हिंदी सिनेमा के सबसे भावुक गीतों में शामिल करता है. रिलीज के करीब 28 साल बाद भी यह गीत लोगों के दिलों को उसी तरह छूता है.

जगजीत सिंह की आवाज ने गीत में भर दी थी आत्मा

‘चिट्ठी ना कोई संदेश' को गजल सम्राट जगजीत सिंह ने अपनी आवाज दी थी. गीत के बोल मशहूर गीतकार आनंद बख्शी ने लिखे थे, जबकि इसका संगीत उत्तम सिंह ने तैयार किया था. इस गाने की सबसे बड़ी ताकत इसकी सादगी है. इसमें कोई भारी-भरकम संगीत नहीं, बल्कि जगजीत सिंह की आवाज और शब्दों का दर्द ही श्रोता के दिल तक सीधे पहुंचता है. यही वजह है कि यह गीत आज भी शोक सभाओं, श्रद्धांजलि कार्यक्रमों और निजी यादों के पलों में अक्सर सुनाई देता है.

काजोल की दमदार फिल्म थी ‘दुश्मन'

साल 1998 में रिलीज हुई ‘दुश्मन' का निर्देशन तनुजा चंद्रा ने किया था. फिल्म में काजोल ने डबल रोल निभाया था, जबकि संजय दत्त, आशुतोष राणा और जस अरोड़ा भी अहम भूमिकाओं में नजर आए थे. फिल्म की कहानी एक जुड़वां बहन के अपनी बहन की मौत का बदला लेने के संघर्ष पर आधारित थी. खासकर आशुतोष राणा का खलनायक वाला किरदार काफी चर्चित हुआ था. फिल्म को इसकी कहानी, अभिनय और संगीत के लिए दर्शकों और समीक्षकों दोनों से सराहना मिली थी.

दर्द की पहचान बन गया यह अमर नगमा

‘चिट्ठी ना कोई संदेश' सिर्फ फिल्म का एक गाना नहीं रहा, बल्कि वक्त के साथ यह बिछड़ने और खोने के एहसास का प्रतीक बन गया. किसी अपने को खोने का दर्द इस गीत के हर शब्द में महसूस होता है. यही कारण है कि नई पीढ़ी भी इस गीत से खुद को जोड़ पाती है. जगजीत सिंह की गायकी और आनंद बख्शी के दिल छू लेने वाले बोलों ने इसे ऐसा कालजयी गीत बना दिया, जिसे सुनते ही आज भी अनगिनत लोगों की यादें ताजा हो जाती हैं.

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