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Daldal Review: 'कछुए जैसी चाल, हाथी जैसी दुम', जानें कैसी है भूमि पेडनेकर की प्राइम वीडियो की सीरीज- पढ़ें रिव्यू

Daldal Review: प्राइम वीडियो पर भूमि पेडनेकर की नई वेब सीरीज दलदल रिलीज हो गई है. जानें कैसी है वेब सीरीज, क्यों उड़ सकती है दिमाग की बत्ती.

Daldal Review: 'कछुए जैसी चाल, हाथी जैसी दुम', जानें कैसी है भूमि पेडनेकर की प्राइम वीडियो की सीरीज- पढ़ें रिव्यू
Daldal Review: जानें कैसी है भूमि पेडनेकर की वेब सीरीज दलदल
नई दिल्ली:

Daldal Review: हर हफ्ते ओटीटी पर वेब सीरीज का सैलाब आता है. इन सैलाब में देसी और विदेशी दोनों तरह की वेब सीरीज की खेप रहती है. इसी तरह इस हफ्ते भी एक ऐसी सीरीज आई जिसकी हीरोइन को टॉयलेट एक प्रेम कथा, दम लगा के हईशा और शुभ मंगल सावधान जैसी फिल्मों के लिए पहचानी जाता है. उनकी पहचान ऐसी अदाकारा के तौर पर है जो विषय आधारित फिल्में चुनती हैं और उनकी एक्टिंग तो माशाल्लाह कमाल ही है. हम बात कर रहे हैं भूमि पेडनेकर की. 30 जनवरी को प्राइम वीडियो पर उनकी वेब सीरीज ने दस्तक दी. जिसका नाम है दलदल. बतौर दर्शक जब इस दलदल में मैंने पांव रखे तो इतना धंसता चला गया कि मदद के लिए टीवी का रिमोट कई बार दबाना पड़ा.

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ये कैसी दलदल?

वजह, दलदल की कहानी बहुत ही कमजोर है. कहानी में मनोरंजन रूपी विटामिन की घोर कमी है. यही कुपोषण इस वेब सीरीज को जबरदस्त नुकसान पहुंचाता है. अब इससे क्या नया मिलता है ये तो भूल ही जाइए क्योंकि राइटर और डायरेक्टर ने इतने ढेर सारे प्रयोग किए हैं, फिर भी वो ना तो वह इसका सिर पकड़ पाए और ना ही पांव. इस तरह ये कन्फ्यूजन की ऐसी दलदल बन गई जिसमें पैर रखना आसान नहीं. कहानी के मामले में फिल्म कुछ कत्लों को लेकर है. भूमि पुलिस अफसर है और इसकी पड़ताल कर रही हैं. लेकिन कत्लों की गुत्थी उलझती ही जाती है और चीजें बार-बार अलग-अलग तरह से सामने आती हैं.

कछुए जैसी चाल , हाथी जैसी दुम 

दलदल की कहानी बहुत ही स्लो है, हर कैरेक्टर आहें भरता नजर आता है. डायलॉग बोलने में इतना समय लेता है ना जानें क्यों. मैं ठहरा भूमि पेडनेकर की एक्टिंग का फैन. लेकिन उन्होंने तो सब्र का इम्तिहान ही ले लिया. हर शब्द को इतना सोचकर बोलना कि आपको लगे भाई बोल तो लो. फिल्म में टेंस दिखने के लिए सब लोगों ने चेहरे पर ऐसे एक्सप्रेशन चिपका रखे हैं जैसे डायरेक्टर से कोई बदला ले रहे हों.

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दलदल वर्डिक्ट

वहीं डायरेक्शन अमृत राज गुप्ता की बात करें तो डायरेक्टर बीच-बीच में एक पुराना टाइप का गाना चलाकर क्या साबित करना चाह रहा है या क्या माहौल बना रहा है, वो समझना तो बूते से ही बाहर की बात है. सात एपिसोड की दलदल कुल मिलाकर ऐसी वेब सीरीज है जिसे थोड़ा टाइट रखा जाता तो कुछ हो सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हो सका और इस दलदल में धंसने के लिए दिमाग तो बिल्कुल इजाजत नहीं देता है. अगर आपको साइकोलॉजिकल थ्रिलर पसंद है तो एक बार आजमा लीजिए, लेकिन अपने रिस्क पर. इस सीरीज को देखकर तो यही कह सकते हैं कि कछुए जैसी चाल, हाथ जैसी दुम...

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