बॉलीवुड के पुराने गानों में कई ऐसे कनेक्शन छिपे हैं, जिन पर सालों बाद भी ध्यान जाए तो हैरानी होती है. ऐसा ही एक दिलचस्प कनेक्शन 1986 की फिल्म ‘अल्लारक्खा' और 2000 की फिल्म ‘फिजा' के दो गानों के बीच है. दोनों फिल्मों के रिलीज होने के बीच पूरे 14 साल का अंतर है. दोनों गानों के गीतकार भी अलग हैं, लेकिन जब इन दोनों गानों की शुरुआत होती है तो पहले कुछ बोल बिल्कुल एक जैसे सुनाई देते हैं. दिलचस्प बात यह भी है कि दोनों गानों को आशा भोसले ने अपनी आवाज दी और दोनों का संगीत अनु मलिक ने तैयार किया था. यानी फिल्म अलग, दौर अलग और गीतकार अलग, लेकिन गाने के शुरुआती बोल बिल्कुल एक जैसे.
1986 में आई थी अल्लारक्खा
सबसे पहले बात उस गाने की, जो 1986 में आई फिल्म अल्लारक्खा का हिस्सा था. गाने की शुरूआत ही इन लफ्जों के साथ होती है. ‘बदतमीजी पे हम आ गए तो.. तुम शरीफों का फिर क्या होगा…'. इसे आशा भोसले ने गाया था और इसका संगीत अनु मलिक ने दिया था. इस गाने के गीतकार राजेंद्र कृष्ण थे. फिल्म का यह गाना अपने अंदाज में काफी बेबाक था इसके बाद की लाइन है ‘हैं शीशे के घर तुम्हारे, मारा पत्थर तो फिर क्या होगा'. गाने का पूरा तेवर शुरुआत की चुनौती भरी पंक्तियों के अनुसार ही रहता है. इस गाने के साथ स्क्रीन पर मीनीक्षी शेषाद्री नजर आती हैं.
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फिर 14 साल बाद आई फिजा
अब कहानी 14 साल आगे बढ़ती है. साल 2000 में आई फिल्म फिजा के इस गाने के गीतकार समीर थे. यानी 1986 के अल्लारक्खा वाले गाने के गीतकार राजेंद्र कृष्ण और 2000 के फिजा वाले गाने के गीतकार समीर अलग थे. ये गाना भी शुरू होता है, ‘बदतमीजी पे हम आ गए तो, तुम शरीफों का फिर क्या होगा. हैं शीशे के घर तुम्हारे, मारा पत्थर तो फिर क्या होगा'. इसके बाद गाना अचानक अपने बिल्कुल अलग अंदाज में आगे बढ़ता है और करिश्मा कपूर के डांस के साथ इस गाने के बोल और टोन दोनों ही बदल जाते हैं. यानी शुरुआत वही, लेकिन उसके बाद गाने की कहानी और मूड बिल्कुल अलग.
फिजा का ये गाना एक चुलबुले डांस नंबर का रूप ले लेता है. यानी 1986 में जो चार पंक्तियां एक अलग तेवर वाले गाने का हिस्सा थीं, वही पंक्तियां 2000 में एक बिल्कुल अलग माहौल वाले गाने की शुरुआत में सुनाई दीं. दो फिल्मों के बीच 14 साल का फासला, दो अलग गीतकार और अलग दौर के बावजूद ये समानता आज भी बॉलीवुड के दिलचस्प म्यूजिक कनेक्शनों में गिनी जा सकती है.
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