हिंदी सिनेमा में कुछ गाने ऐसे होते हैं, जो रिलीज होते ही लोगों के दिलों में अपनी जगह बना लेते हैं. साल 1973 में आई फिल्म ‘बॉबी' का गाना ‘बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो' भी ऐसा ही गीत था. इस गाने ने नरेंद्र चंचल को देशभर में पहचान दिलाई. उनकी दमदार आवाज में ऐसा जादू था कि लोग उन्हें सुनते ही रह जाते थे. राज कपूर की फिल्म में गाने का मौका मिलना उनके करियर का बड़ा मोड़ साबित हुआ. ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया पर फिल्माए गए इस गीत को आज भी लोग याद करते हैं. हालांकि, नरेंद्र चंचल की पहचान सिर्फ फिल्मी गानों तक सीमित नहीं रही. उन्होंने माता रानी के भजनों से करोड़ों लोगों के दिलों में खास जगह बनाई.
ऐसे मिला था ‘बॉबी' में गाने का मौका
नरेंद्र चंचल का जन्म 16 अक्टूबर 1940 को अमृतसर में हुआ था. उनका असली नाम नरेंद्र खरबंदा था. बचपन से ही उन्हें गाने का शौक था और उनकी मां कैलाश वती धार्मिक प्रवृत्ति की थीं. मां के साथ मंदिरों में जाने और भजन सुनने से उनके मन में भक्ति संगीत के प्रति लगाव बढ़ता गया. उनकी आवाज में एक अलग तरह की खनक थी, जो आगे चलकर उनकी पहचान बनी.
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कहा जाता है कि एक कार्यक्रम में नरेंद्र चंचल को गाते सुनकर राज कपूर काफी प्रभावित हुए थे. इसके बाद उन्हें फिल्म ‘बॉबी' में गाने का मौका मिला. फिल्म का गीत ‘बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो' उनकी आवाज में रिकॉर्ड किया गया और देखते ही देखते लोकप्रिय हो गया. इस गाने के लिए उन्हें 1974 में सर्वश्रेष्ठ पुरुष पार्श्व गायक का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला. इस सफलता ने उन्हें फिल्मी दुनिया में एक नई पहचान दी.
भक्ति संगीत से जुड़ा रहा गहरा रिश्ता
फिल्मी दुनिया में नाम कमाने के बावजूद नरेंद्र चंचल का मन भक्ति संगीत में ज्यादा रमता था. ‘चलो बुलावा आया है' और ‘तूने मुझे बुलाया शेरांवालिये' जैसे भजनों ने उन्हें घर-घर में लोकप्रिय बना दिया. उनकी आवाज में जोश और श्रद्धा का ऐसा मेल था कि जागरण में मौजूद लोग देर रात तक उनके भजनों पर झूमते रहते थे. वैष्णो देवी और कटरा से उनका खास जुड़ाव था. हर साल वहां होने वाले उनके कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते थे. उनके भजन सुनकर भक्तों में नई ऊर्जा भर जाती थी. नरेंद्र चंचल केवल गाते ही नहीं थे, बल्कि अपने कार्यक्रमों में सामाजिक बुराइयों के खिलाफ भी लोगों को जागरूक करते थे.
जब आवाज ने दिया साथ और फिर हमेशा के लिए छोड़ गई दुनिया
नरेंद्र चंचल की जिंदगी से जुड़ी कई कहानियां उनकी आस्था और संघर्ष को दिखाती हैं. उनके जीवन में एक ऐसा दौर आने का जिक्र मिलता है, जब उन्हें आवाज से जुड़ी परेशानी का सामना करना पड़ा. हालांकि, आवाज पूरी तरह खोने और भजन गाने से इनकार करने के कारण ऐसा होने के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती.
उनकी लोकप्रियता भारत तक सीमित नहीं रही. विदेशों में रहने वाले भारतीयों के बीच भी उनके भजन खूब पसंद किए जाते थे. साल 2020 में कोरोना महामारी के दौरान उनका गाना ‘कित्थो आया कोरोना' भी चर्चा में आया था.
22 जनवरी 2021 को नरेंद्र चंचल का निधन हो गया. वह भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज आज भी मंदिरों, जागरणों और घरों में सुनाई देती है. ‘अंबे तू है जगदंबे काली' जैसे भजनों से लेकर ‘बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो' तक, उनके गीत संगीत प्रेमियों के बीच आज भी लोकप्रिय हैं. यही उनकी आवाज की खासियत थी, जिसने उन्हें एक ऐसा गायक बनाया जिसे लोग कभी भूल नहीं पाएंगे.
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