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दुष्यंत कुमार की एक लाइन से बना पूरा गाना, स्वानंद किरकिरे की आवाज में बना सदाबहार, 11 साल पुरानी फिल्म में गूंजी थी 51 साल पुरानी हिंदी गजल

हिंदी साहित्य की 51 साल पुरानी गजल जब हिंदी सिनेमा की 11 साल पुरानी फिल्म में आई तो धूम ही मच गई. गजल की सिर्फ दो लाइनों से एक गाना बनाया गया, जो ना सिर्फ मिलेनियल्स बल्कि जेन जी भी में खूब सुपरहिट हुआ. आपने सुना क्या.

दुष्यंत कुमार की एक लाइन से बना पूरा गाना, स्वानंद किरकिरे की आवाज में बना सदाबहार, 11 साल पुरानी फिल्म में गूंजी थी 51 साल पुरानी हिंदी गजल
51 साल पुरानी हिंदी की गजल, 11 साल पुरानी फिल्म में बजी, जेन जी की भी फेवरिट
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नई दिल्ली:

हिंदी गजल के सबसे प्रभावशाली स्वरों में गिने जाने वाले दुष्यंत कुमार की पंक्तियां दशकों बाद भी नई पीढ़ी के दिलों में आज भी गूंजती हैं. उनकी पॉपुलर लाइन, 'तू किसी रेल सी गुजरती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूं', युवाओं की फेवरिट है. ये उनकी पॉपुलर गजल है जो उनकी किताब 'साये में धूप' में शामिल है. लेकिन 11 साल पहले जब इसका इस्तेमाल हिंदी फिल्म में किया गया तो ये लाइनें युवाओं से लेकर हर उम्र के लोगों की पसंदीदा बन गई. ये फिल्म है मसान है जो 2015 में रिलीज हुई थी और इसका निर्देशन नीरज घेवान ने किया था. इस तरह 11 साल पुरानी फिल्म में 51 साल पुरानी गजल की दो लाइनोंं ने धूम मचा दी.

मसान का दिल छू लेने वाला गीत

मसान के 'तू किसी रेल सी गुजरती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूं' को स्वानंद किरकिरे (Swanand Kirkire) ने गाया है. म्यूजिक कम्पोजर पॉपुलर बैंड इंडियन ओशन हैं और इसके बोल वरुण ग्रोवर ने लिखे हैं, जो दुष्यंत कुमार (Dushyant Kumar) की गजल पर आधारित हैं. इस गीत को विक्की कौशल और श्वेता त्रिपाठी पर फिल्माया गया था. बनारस के रेलवे पुल, घाट और धीमी रफ्तार वाली ट्रेन के दृश्य इस गजल को और भी पुख्ता बनाते हैं. इसका फिल्मांकन बेहद कमाल रहा है.

कहानी और कलाकार

‘मसान' वाराणसी की दो कहानियों को जोड़ती है, जाति और सामाजिक दबाव के बीच फंसे युवा प्रेम तथा अपराधबोध और मुक्ति की कहानी. नीरज घेवान ने फिल्म का निर्देशन किया है और पटकथा वरुण ग्रोवर की है. फिल्म में विक्की कौशल, श्वेता त्रिपाठी, ऋचा चड्ढा और संजय मिश्रा लीड रोल में नजर आए. ये विक्की कौशल की दी डेब्यू फिल्म थी. ये फिल्म 24 जुलाई 2015 को रिलीज हुई थी. बेशक बॉक्स ऑफिस पर इसका मजबूत सफर नहीं रहा लेकिन इसे जमकर तारीफें मिली. आईएमडीबी पर रेटिंग 8.1 के आसपास है.

दुष्यंत कुमार का जीवन और रचना संसार

दुष्यंत कुमार का जन्म उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के राजपुर नवादा गांव में 1 सितंबर 1933 के को हुआ. उन्होंने हिंदी कविता, गजल, उपन्यास और नाटक लिखे. उनकी प्रमुख रचनाओं में सूर्य का स्वागत, आवाजों के घेरे, जलते हुए वन का वसंत और गजल संग्रह साये में धूप (1975)  शामिल हैं. 30 दिसंबर 1975 को भोपाल में हार्टअटैक से सिर्फ 42 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था.

मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूं, वो गजल आप को सुनाता हूं
एक जंगल है तेरी आंखों में, मैं जहाँ राह भूल जाता हूं
तू किसी रेल सी गुजरती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूं
हर तरफ ए'तिराज होता है, मैं अगर रौशनी में आता हूं
एक बाजू उखड़ गया जब से, और जियादा वजन उठाता हूं
मैं तुझे भूलने की कोशिश में, आज कितने करीब पाता हूं
कौन ये फासला निभाएगा, मैं फरिश्ता हूं सच बताता हूं

हिंदी साहित्य को सिनेमा में उस तरह की जगह नहीं मिल सकी. लेकिन इस गजल की कुछ पंक्तियों ने दर्शकों पर ऐसा जादू किया जो 11 साल बाद भी कायम है.

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