मध्य प्रदेश में राज्यसभा की 3 सीटों के लिए चुनाव होना है. एक राज्यसभा सांसद को जिताने के लिए 58 वोटों (विधायकों) की जरूरत है. बीजेपी के पास 164 (या कुछ रिपोर्टों के अनुसार 165) विधायक हैं. 2 सीटें (116 वोट) जीतने के बाद भी बीजेपी के पास करीब 48-49 वोट अतिरिक्त बचते हैं. तीसरी सीट जीतने के लिए बीजेपी को सिर्फ 9-10 अतिरिक्त वोटों की जरूरत है. कांग्रेस के पास 64 विधायक थे, लेकिन कुछ की अयोग्यता और पाला बदलने के कारण उनके पास लगभग 61 (कुछ रिपोर्टों के अनुसार 63) वोट पक्के हैं. कांग्रेस अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए पर्याप्त (58) संख्या में है, लेकिन मार्जिन केवल 3 वोटों का है.
बीजेपी ने 2 उम्मीदवार (तरुण चुग और रजनीश अग्रवाल) उतारने के बाद, अचानक तीसरे उम्मीदवार के रूप में महेश केवट को उतार दिया है. महेश केवट को उतारकर बीजेपी ने न सिर्फ कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन के लिए चुनौती खड़ी कर दी है, बल्कि 'ओबीसी' (OBC) और मछुआरा समाज को साधने का एक बड़ा राजनीतिक दांव भी खेला है. बीजेपी का तीसरा उम्मीदवार उतारने का सीधा मतलब है कि बीजेपी को कांग्रेस के विधायकों की 'क्रॉस-वोटिंग' या टूट का पूरा भरोसा है. अगर कांग्रेस के 9-10 विधायकों ने क्रॉस-वोटिंग कर दी, तो मीनाक्षी नटराजन चुनाव हार जाएंगी. इसी खौफ (क्रॉस-वोटिंग के डर) के कारण कांग्रेस अलर्ट मोड में आ गई है. रिपोर्टर अजय शर्मा की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, कांग्रेस अपने सभी विधायकों को भोपाल से हटाकर कर्नाटक (बेंगलुरू) या तेलंगाना जैसे कांग्रेस शासित राज्यों में शिफ्ट कर रही है. इसे कांग्रेस 'चिंतन मंथन' और 'देवदर्शन' का नाम दे रही है, लेकिन असलियत यह है कि वे अपने विधायकों को बीजेपी की पहुंच से दूर रखना चाहते हैं.