जब हम भारत के शहरों की बात करते हैं, तो हमारे दिमाग में चमचमाती सड़कें, बड़ी-बड़ी कॉपोरेट कंपनियां और आधुनिक रहन-सहन की तस्वीरें उभरती हैं। लेकिन इसी प्रगतिशील समाज के समानांतर एक ऐसी सामाजिक कुप्रथा आज भी सांस ले रही है, जिसे हम अमूमन सिर्फ ग्रामीण इलाकों की समस्या मानकर छोड़ देते हैं।