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Youth Ki Awaaz: क्या आप सच में अपनी आजादी से खुश हैं?

Youth Ki Awaaz: खुद के पैरों पर खड़े होना और इंडिपेंडेंट बनना हर किसी की ख्वाहिश होती है. लेकिन इस इंडिपेंडेंट होने पर आपको किन-किन सिचुएशन का सामना करना पड़ता है और आपके सामने क्या चुनौतियां आती हैं चलिए जानते हैं इनके ही बारे में.

Youth Ki Awaaz: क्या आप सच में अपनी आजादी से खुश हैं?
Youth Ki Awaaz: क्या आप अपनी इंडिपेंडेंस से खुश हैं?

Are You Happy To Be Independent?: आज के समय में हर लड़की चाहती है कि वो किसी पर डिपेंट ना हो, अपने पैरों पर खड़ी हो. खुद कमाने, खुद फैसले लेने और अपनी पहचान बनाने का सपना तो हम कोई देखता है? लेकिन क्या इस सपने को पूरा करना इतना आसान होता है, जैसा की सोशल मीडिया पर दिखता है? खुद पर डिपेंड होना आपकी अपनी पहचान तो बनाता है लेकिन क्या आपके भी मन में कभी ये सवाल आया है कि 'क्या जॉब करना सही फैसला था?' आज की इस स्टोरी में हमने लोगों से सीधा सवाल उन महिलाओं से ही पूछा- 'Are You Happy To Be Independent? या कभी लगता है कि जॉब नहीं करनी चाहिए थी?' 

जब इनके जवाब मिले, तो उन्होंने सोचने पर मजबूर कर दिया. कुछ लोगों ने इसे अपनी आजादी और सबसे बड़ी ताकत बताया, तो कुछ ने इसको एक अच्छे चयन के साथ एक बोझ भी बताया. तो चलिए जानते हैं लोगों के जवाब.

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मुझे कभी ऐसा नहीं लगा की मुझे नौकरी नहीं करनी चाहिये थी. एक इंडिपेंडेंट लड़की होना गर्व की बात है. सच है कि कभी-कभी काम का बोझ थका देता है, लेकिन अपनी आइडेंटिटी और सेल्फ रिसपेक्ट के आगे वो थकान कुछ भी नहीं. अपने पैरों पर खड़े होना और अपने फैसले खुद लेना जो सुकून देता है, वह किसी भी जॉब की मुश्किलों से कहीं बड़ा है. एक और चीज जब आप इंडिपेंडेंट होते हैं तो आप अपनी तरह 10 और लड़तियों या लड़कों को इंडिपेंडेंट बनाना सिखाते हैं. जो किन्हीं कारणों से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं.- सुभाषिनी

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हाँ, मुझे लगता है कि मैं लक्की हूँ क्योंकि मुझे अपनी जरूरतों के लिए किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता. कभी-कभी लोग आपकी जरूरतें पूरी कर सकते हैं, जैसे पिता/पति/भाई, लेकिन किसी को खुश न कर पाने और अपने छोटे-छोटे सपनों को पूरा न कर पाने का एहसास किसी भी तरह की आर्थिक मदद से कहीं ज्यादा गहरा होता है.- मानसी निगम

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इंडिपेंडेंट रहना कौन नहीं चाहेगा? अपने पैरों पर खड़ा होना, खासकर लड़कियों के लिए, एक अलग ही आसमान छूने जैसा एहसास होता है. लेकिन सच यह भी है कि आजकल इंडिपेंडेंट होना उतना आसान या मजेदार नहीं रह गया है. जॉब का स्ट्रेस, काम का दबाव, और डेडलाइन्स का बोझ, कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे सांस लेने की भी फुर्सत नहीं मिलती. कई बार तो मन करता है कि शायद जॉब शुरू ही नहीं करनी चाहिए थी, क्योंकि धीरे-धीरे इसका असर हेल्थ पर भी पड़ने लगता है. फिर भी, इंडिपेंडेंट होने का अपना ही सुकून है. अपनी खुशियों के साथ हम अपने लव्ड वन्स की खुशियां भी पूरी कर पाते हैं. शायद यही बैलेंस हमें जीवन की असली वैल्यू समझाता है और स्ट्रेस के बीच भी अपनी मर्जी से जीने का अधिकार देता है.- ऐश्वर्या

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हाँ, मैं सच में इंडिपेंडेंट होकर बहुत खुश हूँ. मेरे काम की स्थिरता ही मेरी आजादी और आत्मविश्वास की मजबूत नींव बन गई है. हर कदम के साथ मुझे अपनी अंदरूनी ताकत बढ़ती हुई महसूस होती है. मैं खुद पर ज्यादा भरोसा करने लगी हूँ और अपने आप के साथ ज्यादा सुकून में हूँ. खासतौर पर मातृत्व के इस सफर में, मेरी यह स्वतंत्रता मुझे ताकत देती है. जिससे मैं अपने बच्चे की परवरिश भी कर पाती हूँ और अपने सपनों को भी आगे बढ़ा पाती हूँ. मैं कभी भी अपनी नौकरी छोड़ना नहीं चाहूँगी.- साक्षी

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हां, अच्छा लगता है कि मैं इंडिपेंडेंट हूं. अपने से पैसा कमा रही हूं, अपनी मर्जी से चीजें खरीद रही हूं. पर कभी-कभी लगता है कि बहुत मोनोटोनस लाइफ हो जाती है. फिर लगता है कि क्यों ही कर रहे हैं जॉब. कुछ और करना चाहिए कोई बिजनेस, अलग-अलग ख्याल आते हैं. इंडिपेंडेंट होना अच्छा लगता है, लेकिन कभी-कभी ऐसे दिन आते हैं कि कुछ भी नहीं करने का मन है. कभी-कभी लगता है जॉब नहीं करना चाहिए. पर पैसे आ रहे हैं और आप अपनी जरूरतें पूरी कर पा रहे हैं तो ठीक हैं. लेकिन जब कुछ लोगों को देखती हूं कि वो वेकेशन पर जा रहे हैं, पहाड़ों पर जा रहे हैं और लाइफ को जी रहे हैं. वो सब चीजें मेरे साथ नहीं हो पाती. तब लगता है कि इंडिपेंडेंट जब आप होते हैं तो कुछ चीजों का त्याग तो करना ही पड़ता है. - शिखा यादव

ऊपर मिले जवाबों से साफ है कि इंडिपेंडेंट होना सिर्फ सैलरी पाने और अपने पैरों पर खड़े होने का ही नाम नहीं है, बल्कि ये एक इमोशनल जर्नी भी है. जिसमें खुद पर प्राउड, थकान, आजादी और कभी-कभी अकेलापन भी है. ऊपर मिले जवाबों में हर किसी की कहानी अलग है. लेकिन इनमें एक बात कॉमन है जो हमें कुछ ना कुछ जरूर सिखाता है. शायद सवाल ये नहीं कि 'जॉब करनी चाहिए थी या नहीं', बल्कि ये है कि 'क्या हम अपने फैसले से सीखकर आगे बढ़ रहे हैं?'

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