आयुर्वेद के अनुसार त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) शरीर को नियंत्रित करने वाली तीन मूलभूत ऊर्जाएं हैं, जिसका सीधा संबंध हमारे भोजन से होता है. जब ये तीनों दोष संतुलन में रहते हैं, तब शरीर स्वस्थ और ऊर्जावान महसूस करता है. लेकिन अगर इनका संतुलन बिगड़ जाए, तो कई तरह की शारीरिक और मानसिक समस्याएं शुरू हो सकती हैं. इसलिए यह समझना जरूरी है कि कौन सा स्वाद किस दोष को बढ़ाता है और कौन सा उसे शांत करता है.
आयुर्वेद में भोजन के छह प्रमुख रस बताए गए हैं मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा), लवण (नमकीन), कटु (तीखा), तिक्त (कड़वा) और कषाय (कसैला). इन रसों का हमारे शरीर के दोषों पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है.
वात दोष
वात दोष को बढ़ाने वाले स्वादों में तीखा, कड़वा और कसैला रस शामिल हैं. अगर कोई व्यक्ति बहुत ज्यादा तीखा या कड़वा भोजन करता है, तो वात बढ़ सकता है, जिससे गैस, सूखापन, बेचैनी या जोड़ों में दर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं. वात को संतुलित रखने के लिए मीठा, नमकीन और खट्टा स्वाद फायदेमंद माना जाता है. साथ ही गर्म और थोड़े तैलीय भोजन का सेवन भी वात को शांत करने में मदद करता है.

पित्त दोष
अब बात करें पित्त दोष की. पित्त का संबंध शरीर की गर्मी और पाचन शक्ति से माना जाता है. तीखा, खट्टा और नमकीन स्वाद पित्त को बढ़ा सकते हैं. अगर कोई व्यक्ति बहुत ज्यादा मसालेदार या खट्टा खाना खाता है, तो शरीर में गर्मी बढ़ सकती है, जिससे एसिडिटी, जलन, चिड़चिड़ापन या त्वचा से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं. पित्त को शांत करने के लिए मीठा, कड़वा और कसैला स्वाद बेहतर माना जाता है. ठंडे और हल्के भोजन, जैसे हरी सब्जियां और फल, पित्त को संतुलित रखने में मदद करते हैं.
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कफ दोष
कफ दोष का संबंध शरीर की स्थिरता, नमी और ताकत से होता है. मीठा, नमकीन और खट्टा स्वाद कफ को बढ़ा सकते हैं. अगर इन स्वादों का ज्यादा सेवन किया जाए, तो शरीर में भारीपन, सुस्ती, वजन बढ़ना या बलगम जैसी समस्याएं हो सकती हैं. कफ को कम करने के लिए तीखा, कड़वा और कसैला स्वाद उपयोगी माना जाता है. हल्का, गर्म और मसालेदार भोजन कफ को संतुलित रखने में मदद करता है.
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(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं