जब भी पुराने समय के घरों की बात होती है, तो सबसे पहले दिमाग में घर के बीचों-बीच बना आंगन याद आता है. यह सिर्फ एक खाली जगह नहीं होती थी, बल्कि पूरे परिवार की जिंदगी का जरूरी हिस्सा होती थी. सुबह-सुबह लोग यहीं पर सूर्य देव को जल चढ़ाते थे और दिनभर यही जगह घरवालों की बातचीत और काम का केंद्र बनी रहती थी. शाम होते-होते यही आंगन बच्चों के खेलने और बड़े-बुजुर्गों के साथ बैठकर चाय पीने की जगह बन जाता था, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पुराने जमाने में घरों के बीचों-बीच आंगन क्यों बनाया जाता था? आज के शहरों में यह परंपरा लगभग खत्म हो चुकी है. आइए जानते हैं कि पहले के समय में आंगन बनवाने के पीछे क्या खास वजहें थीं.
भारत के पुराने घरों में आंगन क्यों होता था?
घर में हवा और रोशनी के लिए
पुराने समय में हर जगह बिजली की सुविधा नहीं होती थी. इसलिए घर में प्राकृतिक रोशनी और ताजी हवा पहुंचाने के लिए आंगन बनाया जाता था, इससे सूरज की रोशनी घर के अंदर तक आती थी और कमरों में हवा का अच्छा बहाव बना रहता था. कई लोग आंगन में पौधे भी लगाते थे, जिससे घर का माहौल ठंडा और ताजा बना रहता था.
महिलाओं के लिए निजी जगह
पुराने समय में महिलाएं ज्यादातर घर के अंदर ही रहती थीं. ऐसे में आंगन उनके लिए ऐसी जगह होती थी, जहां वे आराम से अपने काम कर सकती थीं और खुली हवा का आनंद ले सकती थीं. यह उनके लिए एक सेफ और प्राइवेट जगह जैसा था.
त्योहार और खुशियां मनाने की जगह
घर में होने वाले छोटे-बड़े समारोह, त्योहार और पारिवारिक कार्यक्रम अक्सर आंगन में ही मनाए जाते थे. शादी-ब्याह से लेकर और दूसरे शुभ कामों तक, आंगन लोगों को एक साथ लाने का काम करता था.
नेचर से जुड़े रहने का तरीका
आंगन की वजह से लोग घर के अंदर रहते हुए भी नेचर के करीब महसूस करते थे. यहां से आसमान दिखाई देता था, बारिश का आनंद लिया जा सकता था और रात में तारे भी देखे जा सकते थे.
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