स्कूल में होने वाली पैरेंट-टीचर मीटिंग (PTM) सिर्फ रिपोर्ट कार्ड देखने या नंबर जानने का मौका नहीं होती. ये वो समय होता है जब पेरेंट्स और टीचर्स मिलकर बच्चे की पढ़ाई, बिहेवियर और फ्यूचर को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं. लेकिन कई बार कुछ छोटी-छोटी गलतियां इस बातचीत का मकसद ही बिगाड़ देती हैं. कुछ बातें बच्चे का आत्मविश्वास कम कर सकती हैं, तो कुछ से शिक्षक और अभिभावकों के बीच दूरी बढ़ सकती है. अगर आप चाहते हैं कि PTM आपके बच्चे के लिए फायदेमंद साबित हो, तो इन 7 बातों से जरूर बचें.
बच्चे की बुराई सबके सामने न करें
PTM में कभी भी बच्चे को डांटना, शर्मिंदा करना या उसकी कमियां गिनाना सही नहीं है. "तुम तो कभी पढ़ते ही नहीं" या "तुम हमेशा गलतियां करते हो" जैसी बातें बच्चे के आत्मविश्वास को चोट पहुंचा सकती हैं. बेहतर होगा कि उसकी कमजोरियों पर शांत तरीके से बात करें और सुधार का रास्ता खोजें.
पूरी बातचीत पर अकेले कब्जा न करें
कुछ माता-पिता सिर्फ अपनी बात कहते रहते हैं और शिक्षक की राय सुनने का मौका ही नहीं देते. याद रखें कि शिक्षक रोज आपके बच्चे के साथ समय बिताते हैं और उनके अनुभव काफी अहम होते हैं. इसलिए बातचीत दो तरफा रखें और उनकी सलाह ध्यान से सुनें.

दूसरे बच्चों से तुलना न करें
"देखो, शर्मा जी का बेटा कितना अच्छा पढ़ता है" जैसी बातें बच्चे को दुखी कर सकती हैं. हर बच्चे की सीखने की गति और क्षमता अलग होती है. तुलना करने के बजाय उसके अपने प्रदर्शन और सुधार पर ध्यान दें.
शिक्षक से बहस या झगड़ा न करें
अगर किसी बात से असहमति है तो उसे शांति से रखें. गुस्से में बहस करने से समस्या का हल नहीं निकलता. इससे शिक्षक और अभिभावकों के बीच भरोसा भी कम हो सकता है, जिसका असर आखिरकार बच्चे पर पड़ता है.
शिक्षक की सलाह को नजरअंदाज न करें
अगर शिक्षक किसी आदत, पढ़ाई या व्यवहार को लेकर चिंता जता रहे हैं, तो उसे हल्के में न लें. समय रहते ध्यान देने से कई समस्याएं आसानी से दूर हो सकती हैं. उनकी बात सुनें और घर पर भी जरूरी बदलाव करने की कोशिश करें.
सिर्फ शिकायतें लेकर न पहुंचें
PTM का मकसद केवल स्कूल की कमियां गिनाना नहीं है. अगर आपको कोई शिकायत है तो जरूर रखें, लेकिन बच्चे की अच्छी बातों और स्कूल की सकारात्मक कोशिशों की भी सराहना करें. इससे बातचीत ज्यादा बेहतर और सकारात्मक बनती है.
बच्चे को नजरअंदाज न करें
अगर बच्चा PTM में मौजूद है, तो उसकी मौजूदगी को महत्व दें. सिर्फ उसके नंबरों की बात करने के बजाय उससे भी पूछें कि उसे क्या मुश्किल आ रही है और वह क्या सोचता है. इससे उसे लगेगा कि उसकी राय भी मायने रखती है और वह अपनी पढ़ाई की जिम्मेदारी ज्यादा अच्छे से समझेगा.
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