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पहली बार, पहली पीढ़ी और सपनों की उड़ान! आज भी मैं लाइब्रेरी में बैठा हूं, किताबें खुली हैं, घड़ी चल रही है और मेरी तैयारी जारी है...

Meri Diary UPSC Aspirant: हर साल यूपीएससी परीक्षा में हजारों बच्चे बैठते हैं. लेकिन सफलता सिर्फ कुछ को ही मिल पाती है. मेहनत तो सब करते हैं लेकिन किस्मत सिर्फ कुछ का ही साथ देती हैं. लेकिन भुवनदीप सिंह जैसा जज्बा हार नहीं मानने देता.

पहली बार, पहली पीढ़ी और सपनों की उड़ान! आज भी मैं लाइब्रेरी में बैठा हूं, किताबें खुली हैं, घड़ी चल रही है और मेरी तैयारी जारी है...
Meri Diary UPSC Aspirant: पहली बार, पहली पीढ़ी की सपनों की उड़ान

जम्मू-कश्मीर की ठंडी पहाड़ियों से दिल्ली की भीड़-भाड़ वाली गलियों तक, भुवनदीप सिंह की कहानी सिर्फ एक परीक्षा की तैयारी नहीं है. यह एक साधारण सिख परिवार की पीढ़ीगत उम्मीदों की लड़ाई है. पार्टीशन के बाद भुवन के पर-दादा पाकिस्तान से भागकर जम्मू आए थे. परिवार में माता टीचर हैं, पिता के पास टैक्सी हैं और ट्रांसपोर्ट का काम हैं. माता के अलावा कोई और पढ़ा-लिखा नहीं. छोटी बहन अभी सेकंड ईयर में हैं. भुवनदीप परिवार का पहला सदस्य है जो सरकारी नौकरी या यूपीएससी का सपना देख रहा है. पिता अक्सर कहते हैं, “बेटा, मैंने जो कष्ट झेले, वो तू न झेले. UPSC कर. IAS बन जा.” यही बातें और इन्हें पूरा करने का सपना भुवनदीप के कानों में गूंजता हैं.

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परिवार की जड़ें और मेरे सपनों की शुरुआत-

मैं भुवनदीप सिंह हूं, जम्मू-कश्मीर के एक साधारण सिख परिवार का बेटा. मैं पढ़ने में हमेशा से अच्छा था क्लास में टॉप करता था. पहले ये सपना मेरा अपना नहीं बल्कि मेरे पिता का था, उन्होंने अपनी ज़िंदगी में जो तकलीफ़े देखी हैं शायद वही कारण हैं कि वे चाहते हैं मैं यूपीएससी की परीक्षा में सफल हो कर उनका नाम रोशन करूं. अब ये मेरा भी सपना हैं.

स्कूल से खालसा कॉलेज तक का मेरा सफर-

DPS जम्मू में पढ़ते समय मैं क्लास में हमेशा अलग दिखता था. पगड़ी बांधे, दाढ़ी, सिख परंपरा का प्रतीक. कुछ बच्चे मजाक में रिलीजियस गाने गा देते, “तू तो अलग है न?” बुरा लगता था कभी कभी उल्टा जवाब भी दे देता था, लेकिन इससे कभी हिम्मत नहीं हारी. 11 वी में आर्ट्स लेकर 12वीं में 96.25% मार्क्स हासिल किए. फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी के खालसा कॉलेज से साल 2023 में पोलिटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया.

दिल्ली की कठिन शुरुआत-

साल 2023 में मैंने कोचिंग जॉइन की. लेकिन 5 मार्च 2024 को घर चला गया. जम्मू में परिवार की जिम्मेदारियां और पढ़ाई का माहौल न होने से मेरा फोकस पूरी तरह टूट गया. जनवरी 2025 में जब दिल्ली वापस आया, तब जाकर मैंने फिर से तैयारी शुरू की और मेहनत की और मई में पहला अटेम्प्ट दिया. नतीजा आया – मेरा स्कोर 75, कट-ऑफ 92.33. मैं जानता हूं कि ये मेरा बेस्ट नहीं था इसलिए और मेहनत शुरू कर दी. 

मेरा साइंस और मैथ्स का बैकग्राउंड नहीं हैं, फिर भी मैंने चुनौती ली क्योकि प्रीलिम्स में CSAT एक क्वालिफाइंग पेपर हैं जिसमे मैथ्स, लॉजिकल रीजनिंग और इंग्लिश के सवाल होते हैं. 

मेरी एक साधारण लेकिन अनुशासित दिनचर्या-

अब मेरी जिंदगी बहुत सख्त हो गई है. हर रात मैं 30 मिनट बैठकर अगले दिन का टारगेट लिखता हूं – GS, CSAT, करेंट अफेयर्स, ऑप्शनल - इन सभी का स्लॉट फिक्स करता हूं. सुबह ठीक 7 बजे उठता हूं, तैयार होता हूं और सीधा लाइब्रेरी पहुंच जाता हूं.

पहले स्लॉट में 4-5 घंटे लगातार पढ़ता हूं. 65-33 टेक्नीक यूज करता हूं – 60 मिनट पढ़ाई, 5 मिनट ब्रेक. अगर 30 मिनट पढ़ लूं तो 3 मिनट आंखें बंद करके बैठ जाता हूं या छोटी वॉक कर लेता हूं. औसतन 8 घंटे पढ़ाई होती है, कभी-कभी 12 घंटे तक भी निकाल लेता हूं. 

शाम को ओल्ड राजेंद्र नगर में बैडमिंटन खेलता हूं. स्कूल के दिनों में स्विमिंग में नेशनल लेवल तक खेला था और किक बॉक्सिंग में स्टेट लेवल खेला. खेलना हमेशा से पसंद था, इसलिए खेल मेरे लिए जरूरी ब्रेक है. खेल के बिना फोकस नहीं टिकता लेकिन इसकी वजह से चोट भी लगवा लेता हूं. 

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राजेंद्र नगर में तैयारी करने का पीयर पावर-

मेरा महीने का खर्च सिर्फ 20 हजार रुपये है, जो घर वाले भेजते हैं. यहां कई एस्पिरेंट्स ऐसे हैं जिनके घर में पैसे की कोई कमी नहीं. वे आराम से 4-5 अटेम्प्ट दे सकते हैं. मेरे पास सिर्फ इच्छाशक्ति और परिवार की उम्मीदें हैं.

फिर भी लाइब्रेरी में बैठकर मुझे बहुत मोटिवेशन मिलती है. चारों तरफ UPSC के एस्पिरेंट्स नोट्स बना रहे होते हैं, डिस्कशन कर रहे होते हैं. यह पीयर प्रेशर नहीं, बल्कि पीयर पावर है. देखकर लगता है – अगर ये कर रहे हैं, तो मैं क्यों नहीं? 

मेरी चुनौतियां और अटूट इच्छाशक्ति-

साइंस और मैथ्स में बैकग्राउंड न होने की वजह से CSAT में बहुत मुश्किल होती है. घंटों लग जाते हैं. इस बीच कभी कभी हेल्थ इश्यूज भी आते रहते हैं, रात को मां का फोन आता है, “बेटा, खाना खा लिया? थक तो नहीं गया?” पापा सब सुनते हैं और पूछते हैं कुछ चाहिए तो नहीं?  बहन अपने दिन भर की बातें बताती हैं. इन बातों से घर की याद तो बहुत आती है, लेकिन फिर नया जोश भी मिलता हैं और मेहनत करने में लग जाता हूं. 

प्रीलिम्स की तैयारी-

24 मई को प्रीलिम्स है. जिसके लिए सुबह से लेकर रात तक रोज़ अपने टारगेट को ख़त्म करने में लगा रहता हूं. यूपीएससी का सारा सिलेबस कवर कर पाना मुश्किल हैं लेकिन जो एक बार इस पर पकड़ हासिल कर ले और पैटर्न को अच्छे से समझ ले तो परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर सकता हैं. बस उसी कोशिश में दिन रात मेहनत कर रहा हूं.

आज भी मैं लाइब्रेरी में बैठा हूं. किताबें खुली हैं. घड़ी चल रही है और मेरी तैयारी जारी हैं. भुवनदीप जैसे कई एस्पिरेंट्स देश भर से इस परीक्षा में बैठेंगे, लेकिन सफलता सिर्फ़ कुछ को ही मिल पाएगी. मेहनत तो सब करते हैं लेकिन किस्मत सिर्फ़ कुछ का ही साथ देती हैं. लगातार मेहनत और हार ना मान ने का जज़्बा ही कुछ को सबसे अलग बनाता हैं. 

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