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हम सिर्फ इसलिए सोते हैं क्योंकि हमारे मोबाइल को चार्ज होने के लिए समय चाहिए…

हमें खुद से यह सवाल पूछने की जरूरत है कि क्‍यों मोबाइल, फेसबुक और व्हाट्सऐप के बीच हम खुद को भूलते जा रहे हैं. क्‍यों इंसानी र‍िश्‍तों की कीमत कम होती जा रही है...

हम सिर्फ इसलिए सोते हैं क्योंकि हमारे मोबाइल को चार्ज होने के लिए समय चाहिए…
ख़ुद को सेलिब्रेट कीजिए: रिश्तों, भावनाओं और सच्ची खुशियों की याद

मैं हमेशा बचपन से यह कहानियां सुनते हुए बड़ी हुई हूं कि कैसे तकनीक धीरे-धीरे हर किसी की जीवनशैली का हिस्सा बनती गई. समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती गईं- टेलीग्राफ से टेलीफोन, चिट्ठियों से लैपटॉप, आमने-सामने की मुलाकातों से मोबाइल फोन, और वायरलेस से व्हाट्सऐप तक. तकनीक का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि हम अपने गैजेट्स के बिना खुद को असहाय महसूस करते हैं.

आज भी मैं अपनी दादी की आंखों में वह चमक देखती हूं जब वह दादाजी की चिट्ठियां दोबारा पढ़ती हैं. मुझे आज भी वह गूंजती हुई आवाज़ याद है जब कोई हमारे लैंडलाइन पर फोन करता था. जन्मदिन पर मिलने वाले ग्रीटिंग कार्ड की छोटी-छोटी खुशियां, एक साधारण टेक्स्ट मैसेज से कहीं अधिक होती थीं. मुझे आज भी ताज़ा तारीफों की खुशबू की कमी महसूस होती है, जो अब सिर्फ फेसबुक के “लाइक” तक सिमट गई है.

हम हर समय ऑनलाइन हैं. मैसेज तुरंत पहुंच जाते हैं, कॉल कभी भी हो सकती है, लेकिन आमने-सामने बैठकर बात करने का वक्त जैसे कम होता जा रहा है. तकनीक ने हमें दुनिया से जोड़ा जरूर है, लेकिन क्या इसने हमें एक-दूसरे से दूर नहीं कर दिया? परिवार के साथ बैठकर भी हम मोबाइल स्क्रीन में खोए रहते हैं. दोस्त सामने हों, फिर भी बातचीत चैट बॉक्स तक सिमट गई है.

सवाल यह नहीं है कि तकनीक गलत है, सवाल यह है कि क्या हमने इंसानी जुड़ाव की कीमत पर डिजिटल सुविधा को चुन लिया है?

समय बदलता है और लोगों के तौर-तरीके भी बदल जाते हैं. इंसानों की सामाजिकता की प्रवृत्ति नहीं बदली, लेकिन उसके तरीके बहुत बदल गए हैं. हम अपने पड़ोसियों को तब तक नहीं जानते जब तक वे हमें फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट न भेज दें. हम मान लेते हैं कि हमारे आसपास के लोग ठीक हैं, अगर वे फेसबुक पर सकारात्मक कोट्स शेयर कर रहे हैं या हमें कैंडी क्रश की रिक्वेस्ट भेज रहे हैं.

आइंस्टीन बिल्कुल सही थे जब उन्होंने इस तकनीकी रूप से उन्नत पीढ़ी को “मूर्खों की पीढ़ी” कहा था. हम दुनिया के करीब आ गए हैं, लेकिन अपनी ही दुनिया को भूल गए हैं. इस तेज़ रफ्तार इंस्टेंट कॉफी वाली पीढ़ी में हम दूसरों की लोकेशन तो ट्रैक कर सकते हैं, लेकिन खुद यह नहीं जानते कि हमारा मन कहां भटक रहा है. 

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हम सिर्फ इसलिए सोते हैं क्योंकि हमारे मोबाइल को चार्ज होने के लिए समय चाहिए. इस “LOL” पीढ़ी में, जहां हम “लाफ आउट लाउड” करते हैं, हमने “लॉट्स ऑफ लव” के असली मायने ही भूल गए हैं. हम व्हाट्सऐप के “लास्ट सीन” को देखकर यह जानने की कोशिश करते हैं कि हमारे रिश्तों में वफादारी बची है या नहीं. 

हमारी स्थिति उस हिरण जैसी हो गई है जो जंगल में कस्तूरी की खुशबू ढूंढता फिरता है, जबकि वह खुशबू उसी के भीतर होती है. हम बाहर शांति खोजने में इतने व्यस्त हैं कि यह समझ ही नहीं पाते कि वह हमारे भीतर ही है.

अपने हाथ फैलाइए और खुलकर सांस लीजिए. इस बेड़ी को तोड़ दीजिए जो आपने खुद को तकनीक से बांध रखी है, संवाद की दीवारों को गिरा दीजिए. ज़्यादा मुस्कुराइए और खुलकर हँसिए. खुद से और हर इंसान से प्यार कीजिए. जितनी तारीफ आपको मिलती है, उससे दोगुनी दूसरों को दीजिए. अपने मन में दबे हुए हर विचार को बाहर निकालिए- चाहे वह अच्छा हो या बुरा.

अपनी सारी शिकायतों को शांति के सागर में घोल दीजिए. हर भावना को महसूस कीजिए, चाहे वह गुस्सा ही क्यों न हो- उसे बाहर निकालिए और जाने दीजिए. कभी-कभी अपने भीतर के बच्चे को अपनी ज़िंदगी की ड्राइविंग सीट पर बैठने दीजिए.

याद रखिए, बूढ़ा होना ज़रूरी है, लेकिन बड़ा होना वैकल्पिक है. अपने छुपे हुए शौकों को अपनाइए और हर नए दिन के लिए भगवान का धन्यवाद कीजिए. आज के लिए खुशियां संजोइए और परेशानियों को कल के लिए छोड़ दीजिए. जो जीवन आज आपके पास है, वह हर दिन एक जैसा नहीं रहेगा, इसलिए हर दिन का पूरा आनंद लीजिए.

यह जीवन नफरत और नकारात्मक भावनाओं के लिए बहुत छोटा है. छोटी-छोटी खुशियों में आनंद ढूंढिए- सुहावने मौसम का आनंद लेना, पानी से खेलना, अपने पसंदीदा गाने को सुनना और गाना, रंग-बिरंगे कपड़े पहनना और स्वादिष्ट भोजन का आनंद लेना. अपने दिल की सुनिए, लेकिन अपने दिमाग को साथ रखना मत भूलिए. हमेशा याद रखिए, यह दुनिया एक खूबसूरत जगह है और इसका सबसे खूबसूरत हिस्सा आप हैं… इसलिए खुद को सेलिब्रेट कीजिए.

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