Chandra Grahan 2026: जब भी चंद्र ग्रहण लगता है, तो हमारे घरों में एक अलग तरह का माहौल बन जाता है. कहीं मंदिरों के कपाट बंद हो जाते हैं, कहीं लोग मंत्र जाप करते हैं, तो कहीं उपवास रखा जाता है. कई लोग बिना सोचे-समझे परंपरा निभाते हैं, जबकि कुछ लोग सवाल करते हैं, क्या सच में ग्रहण के दौरान खाना नहीं खाना चाहिए? (Grahan Ke Samay Khana Nahi Khana Chahiye?) क्या इसका सेहत से कोई संबंध है? आज यानि 3 मार्च को साल 2026 का पहला चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है. दरअसल, चंद्र ग्रहण सिर्फ खगोलीय घटना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और आयुर्वेद में इसे खास महत्व दिया गया है. उपवास की परंपरा के पीछे धार्मिक मान्यता के साथ-साथ स्वास्थ्य से जुड़ा दृष्टिकोण भी है. आइए सरल भाषा में समझते हैं कि चंद्र ग्रहण में उपवास क्यों रखा जाता है, इसके फायदे-नुकसान क्या हैं और आयुर्वेद इसे कैसे देखता है.
ग्रहण होने पर उपवास क्यों रखा जाता है? | Why is Fasting Observed During an Eclipse?
1. उपवास के पीछे धार्मिक कारण
हिंदू धर्म में माना जाता है कि ग्रहण के समय वातावरण में नकारात्मक एनर्जी बढ़ जाती है. शास्त्रों के अनुसार, इस समय भोजन पकाना और खाना शुभ नहीं माना जाता. कई लोग मानते हैं कि ग्रहण के दौरान बना भोजन दूषित हो सकता है. इसीलिए ग्रहण से पहले ही खाना बना लिया जाता है या उसमें तुलसी के पत्ते डाल दिए जाते हैं. तुलसी को शुद्धि का प्रतीक माना जाता है.
धार्मिक मान्यता यह भी कहती है कि ग्रहण का समय साधना, मंत्र जाप और ध्यान के लिए सबसे उत्तम होता है. इसलिए शरीर को हल्का रखने के लिए उपवास रखा जाता है, ताकि मन और ध्यान केंद्रित रह सके.

कई लोग मानते हैं कि ग्रहण के दौरान बना भोजन दूषित हो जाता है. Photo Credit: Freepik
2. इंटरमिटेंट फास्टिंग से तुलना
अगर मॉडर्न साइन की बात करें, तो आजकल इंटरमिटेंट फास्टिंग बहुत लोकप्रिय है. इसमें व्यक्ति एक निश्चित समय तक खाना नहीं खाता और फिर सीमित समय में भोजन करता है. चंद्र ग्रहण के दौरान रखा जाने वाला उपवास भी कुछ हद तक इसी तरह है. कुछ घंटों तक भोजन से दूरी बनाना शरीर को आराम देता है.
समानताएं:
- पाचन तंत्र को आराम
- शरीर में जमा टॉक्सिन को बाहर निकालने में मदद
- मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाना
लेकिन अंतर यह है कि इंटरमिटेंट फास्टिंग एक रेगुलर हेल्थ प्रैक्टिस है, जबकि ग्रहण का उपवास धार्मिक आस्था से जुड़ा होता है.
3. आयुर्वेद के अनुसार ग्रहण और डिटॉक्स
आयुर्वेद में माना जाता है कि ग्रहण के समय प्रकृति की ऊर्जा में बदलाव आता है, जिसका असर शरीर के वात, पित्त और कफ दोषों पर पड़ सकता है. इस दौरान पाचन शक्ति कमजोर मानी जाती है. इसलिए भारी और तैलीय भोजन से बचने की सलाह दी जाती है. उपवास को आयुर्वेद में डिटॉक्स का प्राकृतिक तरीका माना गया है. जब हम कुछ समय तक भोजन नहीं करते, तो शरीर अपनी सफाई प्रक्रिया तेज कर देता है.

क्या कहता है आयुर्वेद?
- ग्रहण के दौरान सिर्फ पानी या फलाहार लें
- ग्रहण के बाद स्नान करें
- हल्का, सात्विक भोजन करें
- गुनगुना पानी पिएं
इससे शरीर और मन दोनों हल्का महसूस करते हैं.
4. ग्रहण के बाद क्या खाना शुभ माना जाता है?
परंपरा के अनुसार ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान करके शुद्ध भोजन किया जाता है. शुभ माने जाने वाले हैं भोजन खिचड़ी, मूंग दाल, फल, ताजा बना सात्विक भोजन. भारी, बासी या तला-भुना भोजन करने से बचना चाहिए. कई घरों में ग्रहण के बाद घर की सफाई और गंगाजल का छिड़काव भी किया जाता है.
5. उपवास के फायदे और नुकसान
फायदे:
- पाचन तंत्र को आराम.
- शरीर हल्का महसूस करता है.
- मानसिक एकाग्रता बढ़ती है.
- आत्म-नियंत्रण की भावना मजबूत होती है.
नुकसान:
- कमजोर लोगों को चक्कर आ सकते हैं.
- शुगर मरीजों के लिए लंबा उपवास खतरनाक हो सकता है.
- गर्भवती महिलाओं को सावधानी जरूरी.
इसलिए अगर आपको कोई बीमारी है, तो बिना डॉक्टर की सलाह के लंबा उपवास न करें.
चंद्र ग्रहण में रखा जाने वाला उपवास सिर्फ धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन से भी जुड़ा है. आयुर्वेद इसे शरीर की सफाई और एनर्जी बैलेंस का अवसर मानता है, जबकि मॉडर्न साइंस इसे एक तरह की नेचुरल फास्टिंग के रूप में देख सकता है.
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