International Women's Day 2026 : भारत में सदियों से एक कहावत मशहूर है, अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो. सुनने में यह बात थोड़ी भारी लगती है, लेकिन इसके पीछे छिपे दर्द को सिर्फ वही समझ सकती है जिसने इसे जिया है. महिला दिवस के मौके पर हमने देश के अलग-अलग राज्यों की लड़कियों से बात की और उनसे पूछा कि क्या वो वाकई अगले जन्म में फिर से लड़की बनना चाहेंगी? उनके जवाबों में समाज की हकीकत, डर और सपनों का मिला-जुला अहसास है.
दिल्ली से दीक्षा

रात को 10 बजे के बाद जब मैं ऑफिस से घर लौटती हूं, तो हर कदम पर डर लगता है. सड़क पर चलते हुए जब भी कोई गाड़ी पास से गुजरती है या किसी के कदमों की आवाज आती है, तो मैं बार-बार पीछे मुड़कर देखती हूं. फोन हाथ में टाइट पकड़ लेती हूं कि कहीं कुछ हुआ तो किसे फोन करूंगी. यह जो रोज का खौफ है न, यह इंसान को अंदर से थका देता है. मन करता है कि काश अगले जन्म में यह असुरक्षा न झेलनी पड़े. तो हां, अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो.
असम से माधवी
हमारे यहां के चाय के बागान जितने सुंदर दिखते हैं, वहां का सच उतना ही डरावना है. लड़कियों की तस्करी का जो काला कारोबार यहां चलता है, उसकी खबरें सुनकर रात को नींद नहीं आती. अपनी ही जमीन पर असुरक्षित महसूस करना सबसे बड़ा दर्द है. बेटियों की इस बेबसी को देखकर लगता है कि अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो.
उत्तराखंड से सरोज
पहाड़ों की चढ़ाई जैसा ही मजबूत हौसला है हमारा, पर जब बात स्वास्थ्य सुविधाओं की आती है तो हमें मीलों पैदल चलना पड़ता है. आज भी प्रसव के दौरान कई महिलाएं दम तोड़ देती हैं क्योंकि सुविधाएं नहीं हैं. एक औरत के शरीर की तकलीफों को कोई नहीं समझता. इस कठिन जीवन को देखकर लगता है कि अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो.
यूपी से दीक्षा

पूरा दिन करियर और परिवार की खुशियों के बीच बैलेंस बनाते-बनाते हम खुद को पूरी तरह भूल जाती हैं. हमारी अपनी क्या पसंद है, हमें क्या चाहिए, यह कोई नहीं पूछता. हम बस दूसरों की जरूरतों को पूरा करने वाली मशीन बनकर रह गई हैं. क्या कभी ऐसा दिन आएगा जब हम सिर्फ अपने लिए जिएंगी? अगर नहीं, तो अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो.
हरियाणा से अनिता
हमारे यहां आज भी जब बेटा पैदा होता है तो पूरे मोहल्ले में थाली बजाकर खुशी मनाई जाती है, लेकिन बेटी के जन्म पर सन्नाटा पसर जाता है. बचपन से ही भाई को ज्यादा दूध, ज्यादा बादाम और ज्यादा प्यार मिलते देखा है. मुझे बस उस भेदभाव और पराई होने वाली सोच से आजादी चाहिए. जब तक समाज की नजरों में बेटा और बेटी बराबर नहीं होते, तब तक यही लगेगा कि अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो.

पंजाब से सिम्मी
मुझे अपनी मर्जी के कपड़े पहनने और थोड़ा जोर से हंसने के लिए भी मोहल्ले वालों के तीखे कमेंट सुनने पड़ते हैं. ऐसा लगता है जैसे हर कोई मुझे जज करने के लिए ही बैठा है. मैं बस एक ऐसी जिंदगी चाहती हूं जहां मुझे हर बात पर टोका न जाए और थोड़ी शांति मिले. इस घुटन भरी जिंदगी से तो बेहतर है कि अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो.
राजस्थान से पूनम
घूंघट के पीछे से दुनिया देखना मेरी मजबूरी नहीं थी, पर इसे हमारी परंपरा और संस्कार का नाम देकर मुझ पर थोप दिया गया. मैं भी आसमान देखना चाहती हूं, खुलकर सांस लेना चाहती हूं और अपनी आंखों से दुनिया को समझना चाहती हूं. जब तक यह पर्दे वाली सोच नहीं बदलती, तब तक मन यही कहेगा कि अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो.
महाराष्ट्र से पूजा

मुंबई की लोकल ट्रेन की भीड़ में जब कोई हाथ जानबूझकर गलत तरीके से छूता है, तो रूह कांप जाती है. उस वक्त गुस्सा भी आता है और बेबसी भी महसूस होती है कि हम कुछ कह भी नहीं पाते. हर दिन इस तरह की गंदी नजरों का सामना करना बहुत मुश्किल है. उस वक्त सच में लगता है कि अगर लड़की न होती तो यह सब नहीं सहना पड़ता. तो हां, अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो.
पश्चिम बंगाल से देबोत्री
साल में एक बार दुर्गा पूजा में हम बड़े चाव से देवी को पूजते हैं, पंडाल सजाते हैं. पर वही लोग असल जिंदगी में एक लड़की को इंसान तक नहीं समझते. जब मुझे अपनी छोटी-छोटी जरूरतों और सुरक्षा के लिए खुद अपनों से ही लड़ना पड़ता है, तो बहुत दुख होता है. ऐसी खोखली पूजा का क्या फायदा? इससे तो अच्छा है कि अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो.
मध्य प्रदेश से महिमा
शादी के बाजार में जब लड़के वाले आकर हमें किसी सामान की तरह देखते और परखते हैं, तब अपनी सारी पढ़ाई और काबिलियत बेकार लगने लगती है. वे देखते हैं कि लड़की गोरी है या नहीं, खाना बना पाएगी या नहीं. उस वक्त खुद की अहमियत बिल्कुल खत्म हो जाती है. यह जो अपमान वाली प्रक्रिया है, उसे देखते हुए लगता है कि अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो.
गुजरात से ज्योती

हमारे बिजनेस में सारा दिमाग मेरा चलता है, आइडियाज मेरे होते हैं, पर जब डील फाइनल होती है तो क्रेडिट हमेशा घर के पुरुषों को दे दिया जाता है. लोग समझते हैं कि लड़की है तो इसे क्या ही पता होगा. औरत होने का मतलब हमेशा पर्दे के पीछे रहकर काम करना क्यों है? अपनी पहचान की इस लड़ाई से थक गई हूं, इसलिए अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो.
तमिलनाडु से शरण्या
उत्तर और दक्षिण की भाषा और संस्कृति अलग हो सकती है, पर औरतों को लेकर सोच एक जैसी ही है. आज भी पीरियड्स के दौरान हमें रसोई में जाने से रोका जाता है या अपवित्र समझा जाता है. यह जो कुदरती चीज है, उसे शर्म का विषय बना दिया गया है. इस पुरानी सोच के साथ जीना मुश्किल है, इसलिए अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो.
केरल से बिंदु
साक्षरता के मामले में हमारा राज्य सबसे आगे है, पर आज भी शाम ढलते ही अगर कोई लड़की सड़क पर अकेली दिख जाए, तो लोग उसे शक की निगाह से देखते हैं. सिर्फ पढ़ाई-लिखाई से क्या होगा जब तक समाज की मानसिकता नहीं बदलेगी? आजादी के नाम पर सिर्फ बंदिशें ही मिलती हैं, इसलिए लगता है अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो.
छत्तीसगढ़ से कविता
खेतों में दिन-रात पसीना हम बहाती हैं, जंगलों से लकड़ियां और फल हम चुनकर लाती हैं. पर जब बात हक की आती है, तो जमीन के कागजों पर कहीं भी हमारा नाम नहीं होता. हम सिर्फ मेहनत करने के लिए पैदा हुई हैं क्या? अपनी ही मेहनत का हक न मिल पाना कचोटता है, इसलिए अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो.
झारखंड से पूजा

मेरा सपना है कि मैं नेशनल लेवल पर खेलूं और देश का नाम रोशन करूं. पर घर वाले हर रोज यही ताना देते हैं कि मेडल से पेट नहीं भरेगा, रोटी बनाना सीख लो वरना ससुराल में कौन रखेगा. सपनों और चूल्हे के बीच की यह जंग बहुत थका देने वाली है. और मेरी शादी कर दी गई. अपनी मर्जी का करियर न चुन पाने के कारण लगता है कि अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो.
कर्नाटक से ज्योति
मैं एक बड़ी आईटी कंपनी में ऊंचे पद पर काम करती हूं, पर घर पहुंचते ही मुझे रसोई में जुटना पड़ता है क्योंकि घर का काम सिर्फ औरत की जिम्मेदारी मान ली गई है. पति ऑफिस से आकर आराम कर सकते हैं, पर मुझे डबल शिफ्ट करनी पड़ती है. यह जो बराबरी का ढोंग है, वह चुभता है. तो हां, अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो.
उत्तर प्रदेश से आराधना

मुझे कॉलेज की पढ़ाई जारी रखने के लिए पिता से जिद करनी पड़ी और फिर हर बार बाहर निकलने के लिए भाई से इजाजत लेनी पड़ती है. ऐसा लगता है जैसे मेरी जिंदगी की डोर किसी और के हाथ में है. क्या कभी हम अपनी मर्जी से बिना किसी को सफाई दिए बाहर जा पाएंगे? अपनी ही जिंदगी के फैसले दूसरों से पूछकर लेने पड़ते हैं, इसलिए लगता है अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो.
हिमाचल प्रदेश से राखी
सादगी और भोलापन हमारी पहचान मानी जाती है, पर अक्सर इसी सादगी का फायदा उठाकर हमें चुप करा दिया जाता है. अगर हम अपने हक के लिए आवाज उठाएं तो कहा जाता है कि लड़की बहुत तेज हो गई है. चुप रहकर सहना ही अगर संस्कार है, तो मुझे ऐसा जन्म नहीं चाहिए. अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो.
गोवा से जैनिफर
लोग हमें बहुत मॉडर्न और आजाद समझते हैं, पर हमारी इसी आजादी को अक्सर गलत नजरिए से देखा जाता है. छोटे कपड़े या देर रात तक बाहर रहने का मतलब यह नहीं कि हमारा चरित्र खराब है. समाज के इन तानों और जजमेंट से मैं पूरी तरह थक चुकी हूं. इससे तो अच्छा है कि अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो.
बिहार से लवली

लोग कहते हैं कि बेटियां घर की इज्जत होती हैं, पर इसी इज्जत के भारी बोझ के नीचे हमारी सारी ख्वाहिशों का गला घोंट दिया जाता है. तुम यह नहीं कर सकती क्योंकि लोग क्या कहेंगे, तुम वहां नहीं जा सकती क्योंकि खानदान की नाक कट जाएगी. इज्जत के नाम पर हमें सिर्फ एक कमरे तक समेट दिया जाता है. अपनी पहचान खोकर जीने से तो यही ठीक है कि अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो.
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